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28 मार्च 2017

अरंडी के तेल में ये अदभुत गुण पायें जाते हैं

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अरंडी का पौधा आपको सर्वत्र ही देखने को मिल जाता होगा इसके चौड़े पत्ते होते है इसके बीज से तेल निकाला जाता है इस तेल को कास्टर आयल(Castor oil)भी पुकारते हैं इसका तेल दूसरे तेलों की तुलना में थोडा चिपचिपा होता है-

अरंडी के तेल में ये अदभुत गुण पायें जाते हैं

अरंडी के तेल में बहुत गुण होते है जिनसे आप अभी तक अनजान है इसके फायदे जानकार आप इसका प्रयोग अवश्य ही करना चाहेगें अरंडी का तेल आपके बालो और आपकी त्वचा के लिए बहुत ही फायदेमंद है आज इस पोस्ट में हम इसके गुणों की चर्चा करते है-

अरंडी के तेल(Castor oil)के उपयोग-


1- यदि आपकी एडियाँ बहुत अधिक फटती हैं तो आप रात को सोते समय अरंडी के तेल को हल्का सा गर्म करके अपनी एडियों पर लगायें तथा रात भर लगा रहने के बाद सुबह आप अपनी एडियों को धो ले बस इसका लगातार रोज रात को लगाने से आपकी एडियाँ मुलायम होने के साथ-साथ फटी और दर्द करने से शीघ्र ही छुटकारा दिला देगा-अरंडी का तेल आपको पंसारी या मेडिकल स्टोर से भी मिल जाएगा मेडिकल स्टोर में इसे कास्टर आयल के नाम से लिया जा सकता है-

2- यदि आप अपने चेहरे को चमक देना चाहती है तो अरंडी के तेल की कुछ बुँदे हाथ में लेकर अपने फेस पर थोड़ी देर लगायें और लगभग एक घंटे बाद आप साफ़ पानी से चेहरे को धो लें कुछ दिन रोज करने से आप अपनी चेहरे की त्वचा चमक से भरपूर होता देखेगी-

3- क्या आप बालों की समस्या से परेशान है तो आप अपने बालों को अरंडी के तेल से मसाज करें ये आपके बालों के लिए एक अच्छे कंडीशनर का काम करता है इसके प्रयोग से आपके बाल काले और घने बनते है-

4- अगर आप काली घनी पलके पाना चाहती है तो कास्टर ऑइल का इस्तेमाल करें आप सोने से पहले रुई के फाहे को अरंडी के तेल में डुबोकर अपनी पलकों पर लगाए कुछ ऐसा करने से आप नेचुरल तरीके से घनी पलके पा सकती हैं-

5- एक चमच्च बादाम के तेल में एक चमच्च कास्टर आयल मिलाए और इस मिश्रण को स्ट्रेच मार्क्स पर लगाए आप देखेगें कि कुछ ही दिनों में स्ट्रेच मार्क्स के निशाँन हलके हो जाएंगे-

6- यदि आप नाख़ून टूटने की समस्या से परेशान है तो कुछ दिनों तक सोने से पहले अपने नाखुनो पर कास्टर ऑइल से मसाज करें-इससे आपके नाख़ून मजबूत होंगे और जल्दी नही टूटेंगे-

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Upcharऔर प्रयोग-

27 मार्च 2017

Navratri-नवरात्रि का वैज्ञानिक महत्व

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हमारे देश में साल भर अलग-अलग प्रकार के उत्सव मनाने की हमेशा से एक परम्परा रही है जैसे कि दिवाली, दशहरा, होली, शिवरात्री और नवरात्रि(Navratri)आदि लेकिन इनमे से कुछ उत्सव को हम रात्रि में ही मनाते है-इनका अगर कोई विशेष कारण न होता तो ऐसे उत्सवों को रात्रि न कह कर दिन ही कहा जाता है नवरात्रि का वैज्ञानिक आधार क्या है दरअसल नवरात्र शब्द से “नव अहोरात्रों(विशेषरात्रियों)का बोध” होता है और इस समय शक्ति के नव रूपों की उपासना की जाती है क्योंकि “रात्रि”शब्द सिद्धि का प्रतीकमाना जाता है-

Navratri-नवरात्रि का वैज्ञानिक महत्व

नवरात्रि(Navratri)के दिन नवदिन नहीं कहे जाते हैं लेकिन नवरात्रि के वैज्ञानिक महत्व को समझने से पहले हम थोडा नवरात्रि को समझे-हमारे मनीषियों ने वर्ष में दो बार नवरात्रों(Navratri)का विधान बनाया है मतलब कि विक्रम संवत के पहले दिन अर्थात चैत्र मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा(पहली तिथि)से नौ दिन अर्थात नवमी तक और इसी प्रकार इसके ठीक छह मास पश्चात् आश्विन मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से महानवमी अर्थात विजयादशमी के एक दिन पूर्व तक नवरात्रि(Navratri)मनाया जाता है-लेकिन फिर भी सिद्धि और साधना की दृष्टि से शारदीय नवरात्रों को ज्यादा महत्वपूर्ण माना गया है और इन नवरात्रों में लोग अपनी आध्यात्मिक और मानसिक शक्ति संचय करने के लिए अनेक प्रकार के व्रत, संयम, नियम,यज्ञ, भजन, पूजन, योग साधना आदि करते हैं-

जो व्यक्ति मंत्रो का सिद्ध करना चाहता है वो साधक इन रात्रियों में पूरी रात पद्मासन या सिद्धासन में बैठकर आंतरिक त्राटक या बीज मंत्रों के जाप द्वारा विशेष सिद्धियां प्राप्त करने का प्रयास करते हैं-

नवरात्रों(Navratri)में शक्ति के 51 पीठों पर भक्तों का समुदाय बड़े उत्साह से शक्ति की उपासना के लिए एकत्रित होता है और जो उपासक इन शक्ति पीठों पर नहीं पहुंच पाते वे अपने निवास स्थल पर ही शक्ति का आह्वान करते हैं-

अधिकांश उपासक शक्ति पूजा रात्रि में नहीं बल्कि पुरोहित को दिन में ही बुलाकर संपन्न करा देते हैं यहाँ तक कि सामान्य भक्त ही नहीं अपितु पंडित और साधु-महात्मा भी अब नवरात्रों(Navratri) में पूरी रात जागना नहीं चाहते और ना ही कोई आलस्य को त्यागना चाहता है-

वैज्ञानिक रहस्य-

आज कल बहुत कम उपासक ही आलस्य को त्याग कर आत्मशक्ति,मानसिक शक्ति और यौगिक शक्ति की प्राप्ति के लिए रात्रि के समय का उपयोग करते देखे जाते हैं जबकि मनीषियों ने रात्रि के महत्व को अत्यंत सूक्ष्मता के साथ वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में समझने और समझाने का प्रयत्न किया और अब तो यह एक सर्वमान्य वैज्ञानिक तथ्य भी है कि रात्रि में प्रकृति के बहुत सारे अवरोध खत्म हो जाते हैं और हमारे ऋषि-मुनि आज से कितने ही हजारों-लाखों वर्ष पूर्व ही प्रकृति के इन वैज्ञानिक रहस्यों को जान चुके थे-

एक वैज्ञानिक रहस्य ये भी है कि अगर दिन में आवाज दी जाए तो वह दूर तक नहीं जाती है किंतु यदि रात्रि को आवाज दी जाए तो वह बहुत दूर तक जाती है इसके पीछे दिन के कोलाहल के अलावा एक वैज्ञानिक तथ्य यह भी है कि दिन में सूर्य की किरणें आवाज की तरंगों और रेडियो तरंगों को आगे बढ़ने से रोक देती हैं-रेडियो इस बात का जीता जागता उदाहरण है जहाँ आपने खुद भी महसूस किया होगा कि कम शक्ति के रेडियो स्टेशनों को दिन में पकड़ना अर्थात सुनना मुश्किल होता है जबकि सूर्यास्त के बाद छोटे से छोटा रेडियो स्टेशन भी आसानी से सुना जा सकता है इसका वैज्ञानिक सिद्धांत यह है कि सूर्य की किरणें दिन के समय रेडियो तरंगों को जिस प्रकार रोकती हैं ठीक उसी प्रकार मंत्र जाप की विचार तरंगों में भी दिन के समय रुकावट पड़ती है-

इसीलिए हमारे ऋषि-मुनियों ने रात्रि का महत्व दिन की अपेक्षा बहुत अधिक बताया है मंदिरों में घंटे और शंख की आवाज के कंपन से दूर-दूर तक वातावरण कीटाणुओं से रहित हो जाता है यही रात्रि साधना का वैज्ञानिक रहस्य है जो इस वैज्ञानिक तथ्य को ध्यान में रखते हुए रात्रियों में संकल्प और उच्च अवधारणा के साथ अपने शक्तिशाली विचार तरंगों को वायुमंडल में भेजते हैं उनकी कार्यसिद्धि अर्थात मनोकामना सिद्धि उनके शुभ संकल्प के अनुसार उचित समय और ठीक विधि के अनुसार करने पर अवश्य होती है-

नवरात्र के पीछे का वैज्ञानिक आधार यह कि पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा काल में एक साल की चार संधियाँ हैं जिनमे से मार्च व सितंबर माह में पड़ने वाली गोल संधियों में साल के दो मुख्य नवरात्र पड़ते हैं इस समय रोगाणु आक्रमण की सर्वाधिक संभावना होती है और ऋतु संधियों में अक्सर शारीरिक बीमारियाँ बढ़ती हैं अत: उस समय स्वस्थ रहने के लिए तथा शरीर को शुद्ध रखने के लिए और तन मन को निर्मल और पूर्णत: स्वस्थ रखने के लिए की जाने वाली प्रक्रिया का नाम है"नवरात्रि"-

क्या नवरात्रि(Navratri)में नौ दिन या नौ रात को गिना जाना चाहिए-तो मैं यहाँ बता दूँ कि अमावस्या की रात से अष्टमी तक या पड़वा से नवमी की दोपहर तक व्रत नियम चलने से नौ रात यानी ‘नवरात्रि’ नाम सार्थक है चूँकि यहाँ रात गिनते हैं इसलिए इसे नवरात्रि यानि नौ रातों का समूह कहा जाता है रूपक के द्वारा हमारे शरीर को नौ मुख्य द्वारों वाला कहा गया है और इसके भीतर निवास करने वाली जीवनी शक्ति का नाम ही दुर्गा देवी है-

इन मुख्य इन्द्रियों के अनुशासन,स्वच्छ्ता,तारतम्य स्थापित करने के प्रतीक रूप में-शरीर तंत्र को पूरे साल के लिए सुचारू रूप से क्रियाशील रखने के लिए नौ द्वारों की शुद्धि का पर्व नौ दिन मनाया जाता है और इनको व्यक्तिगत रूप से महत्व देने के लिए नौ दिन नौ दुर्गाओं के लिए कहे जाते हैं-

हालाँकि शरीर को सुचारू रखने के लिए विरेचन,सफाई या शुद्धि प्रतिदिन तो हम करते ही हैं किन्तु अंग-प्रत्यंगों की पूरी तरह से भीतरी सफाई करने के लिए हर छ: माह के अंतर से सफाई अभियान चलाया जाता है जिसमे सात्विक आहार के व्रत का पालन करने से शरीर की शुध्दि,साफ सुथरे शरीर में शुद्ध बुद्धि, उत्तम विचारों से ही उत्तम कर्म,कर्मों से सच्चरित्रता और क्रमश: मन शुध्द होता है क्योंकि स्वच्छ मन मंदिर में ही तो ईश्वर की शक्ति का स्थायी निवास होता है-

जीवनी शक्ति रूपी दुर्गा के नौ रूप हैं-


1.शैलपुत्री
2.ब्रह्मचारिणी
3. चंद्रघंटा
4. कूष्माण्डा
5. स्कन्दमाता
6. कात्यायनी
7. कालरात्रि
8. महागौरी
9. सिध्दीदात्री

इनका नौ जड़ी बूटी या ख़ास व्रत की चीजों से भी सम्बंध है जिन्हें नवरात्र के व्रत में प्रयोग किया जाता है-

1. कुट्टू (शैलान्न)
2. दूध-दही(.ब्रह्मचारिणी)
3. चौलाई (चंद्रघंटा)
4. पेठा (कूष्माण्डा)
5. श्यामक चावल (स्कन्दमाता)
6. हरी तरकारी (कात्यायनी)
7. काली मिर्च व तुलसी (कालरात्रि)
8. साबूदाना (महागौरी)
9. आंवला(सिध्दीदात्री)

ये नौ प्राकृतिक व्रत के खाद्य पदार्थ हैं लेकिन बेटों वाले परिवार में या पुत्र की चाहना रखने वाले परिवार वालों को नवमी में व्रत खोलना चाहिए-


Upcharऔर प्रयोग-

नवरात्रि में आप घटस्थापना कैसे करें

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हम हर वर्ष नवरात्रि का आगमन होता है और हम सभी माता की पूजा अर्चना करते है आप सभी जानते है कि मां की पूजा आरम्भ करने से पहले नवरात्र पूजा की सफलता हेतु घट-स्थापन(Kalash-Installation)का किया जाता है और ये घटस्थापन हमेशा ही शुभ मुहूर्त में किया जाता है-

नवरात्रि में आप घटस्थापना कैसे करें

कैसे करें घटस्थापना(Kalash Installation)-

जहां घट स्‍थापना करनी हो आप उस स्‍थान को शुद्ध जल से साफ करके गंगाजल का छिड़काव करें फिर अष्टदल बनाएं तथा उसके ऊपर एक लकड़ी का पाटा रखें और उस पर लाल रंग का वस्‍त्र बिछाएं इन पर आप पांच स्थान बना कर क्रमशः गणेशजी, मातृका, लोकपाल, नवग्रह तथा वरुण देव को स्‍थान दें फिर सर्वप्रथम थोड़े चावल रखकर श्रीगणेजी का स्मरण करते हुए स्‍थान ग्रहण करने का आग्रह करें-

इसके बाद मातृका, लोकपाल, नवग्रह और वरुण देव को स्‍थापित करें और स्‍थान लेने का आह्वान करें फिर गंगाजल से सभी को स्नान(छिडकाव)कराएं-स्नान के बाद तीन बार कलावा लपेटकर प्रत्येक देव को वस्‍त्र के रूप में अर्पित करें-अब हाथ जोड़कर देवों का आह्वान करें फिर आप सभी देवों को स्‍थान देने के बाद अब आप अपने कलश के अनुसार जौ मिली मिट्टी बिछाएं तथा कलश में जल भरें इसके उपरान्त कलश में थोड़ा और जल-गंगाजल डालते हुए 'ॐ वरुणाय नमः' मंत्र पढ़ें और कलश को पूर्ण रूप से भर दें-

इसके बाद आम की टहनी(पल्लव) डालें तथा जौ या कच्चा चावल कटोरे में भरकर कलश के ऊपर रखें-फिर लाल कपड़े से लिपटा हुआ कच्‍चा नारियल कलश पर रख कलश को माथे के समीप लाएं और वरुण देवता को प्रणाम करते हुए कलश पर स्थापित करें और आप कलश के ऊपर रोली से या स्वास्तिक लिखें फिर मां भगवती का ध्यान करते हुए अब आप मां भगवती की तस्वीर या मूर्ति को भी स्‍थान दें तथा थोड़े से चावल डालें फिर आप मां की षोडशोपचार विधि से पूजा करें-अब यदि सामान्य द्वीप अर्पित करना चाहते हैं तो आप दीपक को प्रज्‍ज्वलित करें-लेकिन यदि आप अखंड दीप अर्पित करना चाहते हैं तो फिर सूर्य देव का ध्यान करते हुए उन्हें अखंड ज्योति का गवाह रहने का निवेदन करते हुए जोत को प्रज्‍ज्वलित करें-यह ज्योति पूरे नौ दिनों तक जलती रहनी चाहिए-इसके बाद पुष्प लेकर मन में ही संकल्प लें कि मां मैं आज नवरात्र की प्रतिपदा से आपकी आराधना अमुक कार्य के लिए कर रहा/रही हूं आप मेरी पूजा स्वीकार करके इष्ट कार्य को सिद्ध करो-

पूजा के समय यदि आप को कोई भी मंत्र नहीं आता हो तो चिंता की कोई बात नहीं है आप केवल दुर्गा सप्तशती में दिए गए नवार्ण मंत्र 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे' से सभी पूजन सामग्री चढ़ाएं चूँकि ये "मां शक्ति" का यह मंत्र अमोघ है तथा आपके पास जो भी यथा संभव सामग्री हो उसी से आराधना करें यदि किसी कारण आपको कोई सामग्री उपलब्ध न हो तो आप अक्षत का भी उपयोग कर सकते हैं तथा संभव हो तो श्रृंगार का सामान और नारियल-चुन्नी जरूर चढ़ाएं-

यदि आप दुर्गा सप्तशती पाठ करते हैं तो संकल्प लेकर पाठ आरंभ करें लेकिन सिर्फ कवच आदि का पाठ कर व्रत रखना चाहते हैं तो माता के नौ रूपों का ध्यान करके कवच और स्तोत्र का पाठ करें तथा इसके बाद आरती करें और दुर्गा सप्तशती का पूर्ण पाठ एक दिन में नहीं करना चाहते हैं तो दुर्गा सप्तशती में दिए श्रीदुर्गा सप्तश्लोकी का 11 बार पाठ करके अंतिम दिन 108 आहुति देकर नवरात्र में श्री नवचंडी जपकर माता का पूर्ण आशीर्वाद भी प्राप्त कर सकते हैं-

माता की पूजा में सिर्फ मन की श्रधा का विशेष प्रभाव भी है इस कलियुग में इसलिए जो लोग विधान पूर्वक न कर सके वो श्रधा से भी मन्त्र जप कर सकते है-ईश्वर का ही दिया सब कुछ है इसलिए आप को ईश्वर को जादा से जादा अपनी श्रद्धा अर्पित करना चाहिए-

अधिक जानकारी नीचे लिंक पर क्लिक करें-


हिन्दू नववर्ष की शुरुवात कैसे करें

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चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के प्रात: ब्रह्म मुहूर्त में नित्यकर्म से निवृत्त होकर अभ्यंग स्नान अथवा तीर्थ, नदी, सरोवर में स्नान करके शुद्ध पवित्र होंना चाहिए तथा स्नान के पश्चात् सूर्योदय के समय नववर्ष के शुभारंभ के अवसर पर सूर्य की प्रथम रश्मि(किरण)के दर्शन के साथ नववर्ष का प्रारम्भ करें-
हिन्दू नववर्ष की शुरुवात कैसे करें

हिन्दू धर्म अनुसार पूर्व दिशा में मुख करके नीचे लिखे मंत्र से सूर्य को जल-पुष्प सहित अर्ध्य प्रदान करें-

           'आकृष्णेन रजसा व्वर्तमानो निवेशयन्नमृतम्मर्त्यञ्च ।
           हिरण्ययेन सविता रधेना देवो याति भुवनानि पश्यन् ।।'

आप सूर्यदेव के सन्मुख ही मानसिक रूप से प्रार्थना करें कि हे सूर्यदेव आप हमारे सभी दुखों को दूर करो जिससे हमारा भला हो आप हमें ज्ञानियों का हित करने वाला ज्ञान प्रदान करें हमारे नेत्रों की रक्षा करें और द्रष्टि को प्रखर करें मुझे सौ वर्षों तक नेत्रों से दिखाई देवे तथा सौ वर्षों का जीवन प्राप्त हो- सौ वर्षों तक श्रवण करें-सौ वर्षों तक अच्छी तरह से संभाषण करें-सौ वर्षों तक किसी के अधीन न रहे और सौ वर्षों से अधिक समय तक भी आनन्दपूर्वक रहें-

आज के दिन क्या सेवन करना है-


1- नववर्ष के पहले दिन आप नीम के कोमल पत्ते, पुष्प, काली मिर्च, नमक, हींग, जीरा मिश्री और अजवाइन मिलाकर चूर्ण बना कर आज के दिन सेवन करने से संपूर्ण वर्ष रोग से मुक्त रहते हैं

2- आज आप अपने गुरु और इष्ट की आरती पूजन करके मंत्र पुष्पांजली और प्रसाद वितरण करें-

3- सभी बंधू-बांधव,मित्रों को नववर्ष का अभिनन्दन और परस्पर शुभकामना, मंगलकामना, नववर्ष मधुर मिलन आदि का कार्यक्रम आयोजित करें-

4- नवसंवत्सर आरंभ के दिन नूतन वर्ष के पंचांग की पूजन, पंचांग का फल श्रवण, पंचांग वाचन और पंचांग का दान करने का उल्लेख धर्मशास्त्र में लिखा है कई जगह यह परंपरा आज भी गाँव-गाँव में प्रचलित है गांव में गुरु, पुरोहित आदि गांवों में पंचांग वाचन करते है-

Upcharऔर प्रयोग-

स्त्री एवं पुरुषों में नपुंसकता का घरेलू प्रयोग

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हमारे समाज में आज भी निसंतान(Childless)होना एक अभिशाप माना जाता रहा है जिसमें नपुंसकता(Impotence)के कारण निःसंतान होना भी एक सामान्य कारण होता है कुछ अधिक एलोपैथिक दवाओं के सेवन से भी नपुंसकता उत्पन्न कर संतान उत्पन्न करने में व्याधा उत्पन्न कर सकती हैं-
स्त्री एवं पुरुषों में नपुंसकता का घरेलू प्रयोग

इनमें उच्चरक्तचाप की औषधियां एवं मधुमेह जैसे रोग भी शामिल हैं कई बार नपुंसकता(Impotence)का कारण शारीरिक न होकर मानसिक होता है ऐसे में केवल चिकित्सकीय काऊंसीलिंग ही काफी होती है-

कुछ आयुर्वेदिक नुस्खे स्त्री एवं पुरुषों में नपुंसकता-जन्य निःसंतानता के साथ ही शुक्राणुजन्य समस्याओं को दूर करने में कारगर सिद्ध होती हैं जो निम्नलिखित हैं 

निसंतानता(Childless)के घरेलू प्रयोग-

1- आप आयुर्वेद दवा बेचने वाले पंसारी से-श्वेत कंटकारी लाकर उसके  पंचांग को सुखाकर पाउडर बना लें तथा स्त्री को मासिक धर्म के पाचवें दिन से लगातार तीन दिन तक प्रातः एक बार दूध से दें तथा पुरुष को-अश्वगंधा 10 ग्राम, शतावरी 10 ग्राम, विधारा 10 ग्राम, तालमखाना 5 ग्राम, तालमिश्री 5 ग्राम सब मिलाकर 2 चम्मच दूध के साथ प्रातः सायं लेने पर निश्चित लाभ होता है-

2- स्त्री में "फलघृत" नामक आयुर्वेदिक औषधि भी इनफरटीलीटी को दूर करता है-

3- पलाश के पेड़ की एक लम्बी जड़ में लगभग 250 एम.एल. की एक शीशी खुले मुंह की लगाकर आप इसे जमीन में दबा दें तथा एक सप्ताह बाद आप इसे निकाल लें-अब इसमें इकठ्ठा होने वाला निर्यास द्रव प्रातः पुरुष को एक चम्मच शहद से दें-यह शुक्रानुजनित कमजोरी(ओलिगोस्पर्मीया)को दूर करने में मददगार होता है-

4- अश्वगंधा 1.5 ग्राम. शतावरी 1.5 ग्राम, सफ़ेद मुसली 1.5 ग्राम एवं कौंच बीज चूर्ण को 75 मिलीग्राम की मात्रा में गाय के दूध से सेवन करने से भी नपुंसकता दूर होकर कामशक्ति बढ़ जाती है-

5- शिलाजीत का 250 मिलीग्राम से 500 मिलीग्राम की मात्रा में दूध के साथ नियमित सेवन भी मधुमेह आदि के कारण आयी नपुंसकता को दूर करता है-

6- नपुंसकता(Impotence)को दूर करने के लिए उचित चिकित्सकीय परामर्श एवं समय पर कुछ आयुर्वेदिक औषधियों का प्रयोग कर इस बीमारी से निजात पाया जा सकता है-

अधिक देखने के लिए नीचे टाइटल पर क्लिक करें-


26 मार्च 2017

वेरीकोज वेन्स(Varicose Veins)क्या है

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रक्त में हिमोग्लोबिन(Hemoglobin)नामक लाल पदार्थ होता है इसकी विशेषता यह है कि कार्बन डाइऑक्साइड एवं ऑक्सीजन दोनों के साथ प्रति वतर्यता (Reversibly)से जुड़ सकता है-हिमोग्लोबिन जब शरीर के ऊतकों से कार्बन डाइऑक्साइड को ग्रहण करता है वह कार्बोक्सी हिमोग्लोबिन कहलाता है कार्बोक्सी हिमोग्लोबिन वाला रक्त अशुद्ध होता है जो शिराओं से होकर फेफड़ों में श्वांस लेने की प्रक्रिया में हीमोग्लोबिन कार्बन डाइऑक्साइड को छोड़कर शुद्ध ऑक्सीजन ग्रहण करता है-

वेरीकोज  वेन्स(Varicose Veins)क्या है

क्या होता है वेरीकोज  वेन्स(Varicose Veins)-


1- यह शुद्ध रक्त धमनियों द्वारा कोशिकाओं तक पहुंचता है तथा अशुद्ध रक्त का रंग नील लोहित या बैंगनी होता है-शिराओं की भित्तियां पतली होती हैं और ये त्वचा के ठीक नीचे होती हैं-इसीलिए ऊपर से शिराओं को देखना आसान होता है अशुद्ध नील लोहित रंग के रक्त के कारण शिराएं(Veins)हमें नीले रंग की दिखाई देती हैं-शिराओं की तुलना में धमनियों की भित्ति अधिक मोटी होती है और काफी गहराई में स्थित होती है-इस कारण लाल रक्त प्रवाहित होने वाली धमनी हमें दिखाई नहीं देती है-

2- हमारे शरीर में रक्त को वापस ह्रदय तक ले जाने वाली शिराए जब मोटी होकर उभर कर दिखाई देने लगती है तथा सुजन आ जाती है तब व्यक्ति को टांगो में थकान और दर्द महसूस होता है अधिक उभरी शिराओ के होने का मुख्य कारण  हृदय की तरफ रक्त ले जाने वाली शिराओं में वाल्व लगे होते हैं जिसके कारण ही रक्त का प्रवाह एक दिशा की ओर होता है-

3- कई प्रकार की बीमरियों(कब्ज, खानपान सम्बन्धी विकृतियां, गर्भावस्था से सम्बन्धित रोग) के कारण शिराओं के रक्त संचार में बाधा उत्पन्न हो जाती है जिसकी वजह से ये शिरायें फैल जाती हैं और रक्त शिराओं में रुककर जमा होने लगता है और सूजन हो जाती हैं और अन्य प्रकार की परेशानियां उत्पन्न हो जाती हैं जैसे-व्यायाम की कमी, बहुत समय तक खड़ा रहना, अधिक तंग वस्त्र, अधिक मोटापा के कारण भी यह रोग हो जाता है यह रोग पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं को अधिक होता है क्योंकि आजकल रसोईघर में खड़े होकर ही भोजन बनाया जाता है-

4- इस रोग के कारण रोगी व्यक्ति के टांगों में दर्द होता है तथा रोगी व्यक्ति को थकान और भारीपन महसूस होता है इसमें रोगी के टखने सूज जाते हैं और रात के समय टांगों  में ऐंठन होने लगती है तथा त्वचा का रंग बदल जाता है और उसके निचले अंगों में त्वचा के रोग भी हो जाते हैं-

प्राकतिक उपचार(Natural Treatments)करे-


1- रोगी व्यक्ति को नारियल  का पानी, जौ का पानी, हरे धनिये का पानी, खीरे का पानी, गाजर का रस, पत्तागोभी, पालक का रस आदि के रस को पी कर उपवास रखना चाहिए तथा हरी सब्जियों का सूप भी पीना चाहिए-

2- कुछ दिनों तक रोगी व्यक्ति को फल, सलाद तथा अंकुरित दालों को भोजन के रूप में सेवन करना चाहिए तथा रोगी व्यक्ति को वे चीजें अधिक खानी चाहिए जिनमें विटामिन सी तथा ई की मात्रा अधिक हो और उसे नमक, मिर्च मसाला, तली-भुनी मिठाइयां तथा मैदा नहीं खाना चाहिए-

3- पीड़ित रोगी को गरम पानी का एनिमा भी लेना चाहिए तथा इसके बाद रोगी व्यक्ति को कटिस्नान करना चाहिए और फिर पैरों पर मिट्टी का लेप करना चाहिए तथा यदि रोगी व्यक्ति का वजन कम हो जाता है तो मिट्टी का लेप कम ही करें-

4- जब रोगी व्यक्ति को ऐंठन तथा दर्द अधिक तेज हो रहो हो तो गर्म तथा इसके बाद ठण्डे पानी से स्नान करना चाहिए-रोगी व्यक्ति को गहरे पानी में खड़ा करने से उसे बहुत लाभ मिलता है-

5- इस रोग से पीड़ित रोगी को सोते समय पैरों को ऊपर उठाकर सोना चाहिए-इससे रोगी व्यक्ति को बहुत अधिक लाभ मिलता है-

6- यदि इस रोग में कुछ ये आसन का उपयोग करे तो इसमें निश्चित ही लाभ  होता है जैसे-सूर्यनमस्कार,शीर्षासन,सर्वागासन,विपरीतकरणी,पवनमुक्तासन,उत्तानपादासन,योगमुद्रासन आदि ये किसी अच्छे योगाचार्य से सीख सकते है इसमें समय अवश्य लग सकता है मगर धीरे-धीरे ये रोग चला जाता है-

अधिक जानकारी के लिए देखें-

Upcharऔर प्रयोग-

25 मार्च 2017

बच्चेदानी में सूजन का कारण और उपचार

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कई बार महिलाओं की बच्चेदानी(Uterus)में सूजन आ जाती है बदलते वातावरण या मौसम का प्रभाव गर्भाशय(Uterus)को अत्यधिक प्रभावित करता है जिससे प्रभावित होने पे महिलाओं को बहुत कष्ट उठाना पड़ता है इसके प्रभाव से भूंख नही लगती है सर-दर्द-हल्का बुखार या कमर-दर्द-और पेट दर्द की समस्या रहती है-
बच्चेदानी में सूजन का कारण और उपचार

गर्भाशय(Uterus)की सूजन क्या कारण है-


1- पेट की मांसपेशियों में अधिक कमजोरी आ जाने के कारण तथा व्यायाम न करने के कारण या फिर अधिक सख्त व्यायाम करने के कारण भी गर्भाशय(Uterus)में सूजन(Swelling)हो सकती है-

2- पेट में गैस तथा कब्ज बनने के कारण गर्भाशय(Uterus)में सूजन हो जाती है-

3- औषधियों(Medicine)का अधिक सेवन करने के कारण भी गर्भाशय(Uterus)में सूजन हो सकती है-

4- जरुरत से जादा अधिक सहवास(Sexual Intercourse)करने के कारण भी गर्भाशय(Uterus)में सूजन हो सकती है-

5- भूख से अधिक भोजन सेवन करने के कारण स्त्री के गर्भाशय में सूजन आ जाती है तथा अधिक तंग कपड़े पहनने के कारण भी गर्भाशय(Uterus)में सूजन(Swelling)हो सकती है-प्रसव के दौरान सावधानी न बरतने के कारण भी गर्भाशय में सूजन हो सकती है-

गर्भाशय में सूजन(Swelling)का उपचार-


1- गर्भाशय(Uterus)में सूजन(Swelling)से पीड़ित महिला को चटपटे मसालों-मिर्च-तली हुई चीजें और मिठाई से परहेज रखना चाहिए-

2- पीड़ित स्त्री को दो तीन बार अपने पैर कम से कम एक घंटे के लिए एक फुट ऊपर उठाकर लेटना चाहिए और आराम करना चाहिए-

3- गर्भाशय(Uterus)में सूजन(Swelling)हो जाने पर महिला रोगी को चार-पांच दिनों तक फलों का जूस पीकर उपवास करना चाहिए- उसके बाद बिना पका हुआ संतुलित आहार लेना चाहिए-

4- निर्गुण्डी को किसी भी प्रकार के बाहरी भीतरी सूजन के लिए इसका उपयोग किया जाता है यह औषधि वेदना शामक और मज्जा तंतुओं को शक्ति देने वाली है वैसे आयुर्वेद में सुजन उतारने वाली और भी कई औषधियों का वर्णन आता है पर निर्गुण्डी इन सब में अग्रणी है और सर्वसुलभ भी-नीम,(निर्गुन्डी) सम्भालु के पत्ते और सोंठ सभी का काढ़ा बनाकर जननांग में लगाने से सुजन ख़त्म हो जाती है-

5- बादाम रोगन एक चम्मच, शरबत बनफ्सा तीन चम्मच और खांड पानी में मिलाकर सुबह पीयें तथा बादाम रोगन का एक रुई का फोया जननांग के मुह पर रखें-इससे गर्मी के कारण गर्भाशय(Uterus)में सूजन(Swelling)ठीक हो जाती है-

6- अरंड के पत्तों का रस छानकर रुई में भिगोकर जननांग में लगाने से भी सूजन ख़त्म हो जाती है-

7- अशोक की छाल 120 ग्राम, वरजटा, काली सारिवा, लाल चन्दन, दारूहल्दी, मंजीठ प्रत्येक को 100-100 ग्राम मात्रा, छोटी इलायची के दाने और चन्द्रपुटी प्रवाल भस्म 50-50 ग्राम, सहस्त्रपुटी अभ्रक भस्म 40 ग्राम, वंग भस्म और लौह भस्म 30-30 ग्राम तथा मकरध्वज गंधक जारित 10 ग्राम की मात्रा में लेकर सभी औषधियों को कूटछानकर चूर्ण तैयार कर लेते हैं फिर इसमें क्रमश: खिरेंटी, सेमल की छाल तथा गूलर की छाल के काढ़े में 3-3 दिन खरल करके 1-1 ग्राम की गोलियां बनाकर छाया में सुखा लेते हैं फिर इसे एक या दो गोली की मात्रा में मिश्रीयुक्त गाय के दूध के साथ सुबह-शाम सेवन करना चाहिए-इसे लगभग एक महीने तक सेवन कराने से स्त्रियों के अनेक रोगों में लाभ मिलता है-इससे गर्भाशय(Uterus)में सूजन(Swelling)जलन, रक्तप्रदर, माहवारी के विभिन्न विकार या प्रसव के बाद होने वाली दुर्बलता इससे नष्ट हो जाती है-

8- एरण्ड(अंडी) के पत्तों का रस छानकर रूई भिगोकर गर्भाशय के मुंह पर तीन-चार दिनों तक रखने से गर्भाशय(Uterus)में सूजन(Swelling)मिट जाती है-

9- कासनी की जड़, गुलबनफ्सा और वरियादी 6-6 ग्राम की मात्रा में, गावजवां और तुख्म कसुम 5-5 ग्राम, तथा मुनक्का 6 या 7 को एक साथ बारीक पीसकर उन्हें 250 ग्राम पानी के साथ सुबह-शाम को छानकर पिला देते हैं यह उपयोग नियमित रूप से आठ-दस दिनों तक करना चाहिए-इससे गर्भाशय(Uterus)में सूजन(Swelling)रक्तस्राव, श्लैष्मिक स्राव(बलगम, पीव)आदि में पर्याप्त लाभ मिलता है-

10- चिरायते के काढ़े से योनि को धोएं और चिरायता को पानी में पीसकर पेडू़ और योनि पर इसका लेप करें इससे सर्दी की वजह से होने वाली गर्भाशय(Uterus)की सूजन(Swelling) नष्ट हो जाती है-

11- रेवन्दचीनी को 15 ग्राम की मात्रा में पीसकर आधा-आधा ग्राम पानी से दिन में तीन बार लेना चाहिए-इससे गर्भाशय की सूजन मिट जाती है-
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