हिस्टीरिया का उपचार-Treatment of Hysteria

हिस्टीरिया का उपचार-Treatment of Hysteria-


पिछली पोस्ट में हमने हिस्टीरिया(Hysteria)के लक्षण के बारे में बताया था शुरू में आपको रोगी के अंदर अगर जांच में इस तरह के लक्षण देखने को मिले तो आप सबसे पहले रोगी को होश में लाने के लिए उसे लिटा देना चाहिए तथा साथ ही कमरे की खिड़कियां-दरवाजे खोल कर रखना चाहिए ताकि स्वच्छ और खुली हवा आ सके-

Treatment of Hysteria


रोगी को कुछ तरल पेय जैसे-शर्बत-फलों का रस या मीठा दूध आदि पिलाएं तथा रोगी को हल्का-फुल्का वातावरण, हास्यपूर्ण और सुखमय माहौल प्रदान करें या फिर पांच-दस दौरों के समय उसकी देखभाल, संभाल, परवाह, न करें-तो रोग स्वतः ठीक हो जाएगा-

यदि होश आने में देरी हो रही हो तो आप हिस्टीरिया रोगी को ठंडे पानी के छींटे या सिर पर ठंडे पानी की धार तब तक डालें जब तक हिस्टीरिया रोगी होश में न आ जाए फिर होश में आने पर रोगी को आप सांत्वना दें वैसे भी ये स्थिति कुछ समय के लिए ही होती है पर अगर समय रहते इलाज ना किया जाए तो ये कंपन, लकवा जैसे रोग में बदल सकते हैं इसलिए इस रोग का इलाज करवाने के बाद रोगी को दिमागी डॉक्टर की देखरेख में पूरा इलाज करवाना चाहिए-

हिस्टीरिया(Hysteria)का उपचार-


  1. किसी स्त्री में हिस्टीरिया(Hysteria)रोग के लक्षण नज़र आते ही उसे तुरन्त किसी मनोचिकित्सक से इस रोग का इलाज कराना चाहिए-हिस्टीरिया के रोगी को गुस्से में या किसी और कारण से मारना नहीं चाहिए क्योंकि इससे उसे और ज़्यादा मानसिक और शारीरिक कष्ट हो सकते हैं तथा एक बात का ख़ासतौर पर ध्यान रखना चाहिए कि हिस्टीरिया रोगी अपने आपको किसी तरह का नुकसान ना पहुंचा पाए-
  2. इस रोग के रोगी की सबसे अच्छी चिकित्सा उसकी इच्छाओं को पूरा करना तथा उसे संतुष्टि देना है इसके अलावा रोगी को शांत वातावरण में घूमना चाहिए-रोगी के सामने ऐसी कोई बात न करनी चाहिए जिससें उसे कोई चिन्ता सतायें-
  3. इस रोग से पीड़ित स्त्रियों को जब दौरा पड़ता है तो उसके शरीर के सारे कपड़े ढीले कर देने चाहिए तथा उसे खुली जगह पर लिटाना चाहिए और उसके हाथ और तलवों को मसलना चाहिए-
  4. जब इस रोग से पीड़ित रोगी बेहोश हो जाए तो उसके अंगूठे के नाखून में अपने नाखून को चुभोकर उसकी बेहोशी को दूर करना चाहिए और फिर उसके चेहरे पर ठंडे पानी के छींटे मारनी चाहिए-इससे रोगी स्त्री को होश आ जाता है और उसका बेहोशीपन दूर हो जाता है जब रोगी स्त्री बेहोश हो जाती है तो हींग तथा प्याज को काटकर सुंघाने से लाभ मिलता है-
  5. बेहोश होने वाली स्त्री को होश में लाने के लिए सबसे पहले रोगी की नाक में नमक मिला हुआ पानी डाल दें इससे बेहोशी रोग ठीक हो जाएगा लेकिन यह उपाय शीघ्र ही और कुछ ही समय के लिए है इसका अच्छी तरह से इलाज तो अपने डाक्टर या अपने वैद्य से ही कराना चाहिए-
  6. इस रोग से पीड़ित स्त्री का इलाज करने के लिए कुछ दिनों तक उसे फल तथा बिना पका हुए भोजन खिलाना चाहिए-हिस्टीरिया(Hysteria)रोग से पीड़ित रोगी के लिए जामुन का सेवन बहुत ही लाभदायक होता है इसलिए रोगी स्त्री को प्रतिदिन जामुन खिलाना चाहिए-
  7. यदि इस रोग से पीड़ित स्त्री प्रतिदिन एक चम्मच शहद को सुबह-दोपहर-शाम चाटे तो उसका यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है-
  8. सर्वप्रथम एरंड तेल में भुनी हुई छोटी काली हरड़ का चूर्ण 5 ग्राम प्रतिदिन लगातार दे कर उसका उदर शोधन तथा वायु का शमन करें फिर सरसों, हींग, बालवच, करजबीज, देवदाख मंजीज, त्रिफला, श्वेत अपराजिता मालकंगुनी, दालचीनी, त्रिकटु, प्रियंगु शिरीष के बीज, हल्दी और दारु हल्दी इन सभी को बराबर-बराबर ले कर गाय या बकरी के मूत्र में पीस कर आप गोलियां बना कर छाया में सुखा लें तथा इसका उपयोग पीने, खाने, या लेप में किया जाता है-इसके सेवन से हिस्टीरिया रोग शांत होता है-
  9. लहसुन को छील लें अब चार गुना पानी और चार गुना दूध में मिला कर इसे धीमी आग पर पकाएं तथा  आधा दूध रह जाने पर छान कर रोगी को थोड़ा-थोड़ा पिलाते रहें- 

  10. काले मुँह वाले लंगूर की लीद इकट्ठी करके उसे छाया में सुखाकर उसका पाउडर बना लें और जब रोगी को हिस्टीरिया का दौरा पड़े तब उसके मुँह से झाग-फेन आदि ठीक से साफ करके चवन्नी भर(2.5ग्राम) पाउडर में आठ से दस ग्राम तक अदरक का रस मिलाकर उसके गले में उतार दें दूसरे दिन ठीक उसी समय रोगी को दौरा पड़े या न पड़े लेकिन यही उपचार फिर से करें बस ऐसा निरंतर पाँच दिन तक करने से हिस्टीरिया में लाभ होता है-
  11. ब्रह्मी,जटामांसी,शंखपुष्पी,असगंध और बच को समान मात्रा में पीस कर चूर्ण बना कर रख लें तथा एक छोटा चम्मच दिन में दो बार दूध के साथ सेवन करायें तथा इसके साथ ही सारिस्वतारिष्ट दो चम्मच दिन में दो बार पानी मिला कर सेवन करें- 
  12. ब्राह्मी वटी और अमर सुंदरी वटी की एक-एक गोली मिला कर सुबह तथा रात में सोते समय दूध के साथ सेवन करने से लाभ मिलता है रोगी को बालवच चूर्ण को शहद मिला कर लगातार सवा माह तक सेवन कराएं और भोजन में केवल दूध एवं छाछ का सेवन करे तो उसका हिस्टीरिया शांत हो जाता है और अगर रोगी कुंवारी लड़की है तो उसकी जल्द से जल्द शादी करवा देनी चाहिए तो यह रोग अपने आप दूर हो जाएगा-
  13. केसर, कज्जली, बहेड़ा, कस्तूरी, छोटी इलायची, जायफल और लौंग को बराबर मात्रा में मिलाकर सात दिन तक सौंफ के काढ़े में मिलाकर और घोटकर तैयार कर लें-इसके बाद इस मिश्रण को तैयार करके इलायची के दाने के बराबर की गोलियां बना लें और चार-चार ग्राम मूसली सफेद तथा सौंफ के काढ़े से सुबह और शाम सेवन करना चाहिए अगर मासिकस्राव के समय में कोई कमी हो तो सबसे पहले ऊपर बताई गई दवा से इलाज करें-
  14. यह रोग कई बार रक्त की कमी के हो जाने के कारण से भी जाता है हिस्टीरिया रोग के होने पर रोगी स्त्री को लगभग एक ग्राम के चौथाई भाग के बराबर लोह भस्म को एक चम्मच के बराबर शहद में मिलाकर सुबह और शाम के समय में चटा दें और फिर ऊपर से 10-12 ग्राम मक्खन तथा मलाई के साथ खिला दें तथा इसके साथ दाल, रोटी, दूध, मलाई, घी का इस्तेमाल कर सकते
  15. हिस्टीरिया रोग अक्सर ज़्यादा पेशाब करने से ही कम हो जाता है इसलिए इस रोग की स्त्री को बार-बार पेशाब कराने की कोशिश कराते रहना चाहिए-
  16. इस रोग से पीड़ित रोगी को सकारात्मक सोच रखनी चाहिए तभी यह रोग पूरी तरह से ठीक हो सकता है इस रोग को ठीक करने के लिए स्त्रियों को योगनिद्रा का अभ्यास करना चाहिए-
  17. हिस्टीरिया रोग को ठीक करने के लिए कई प्रकार के आसन है जिनको प्रतिदिन करने से यह रोग कुछ दिनों में ही ठीक हो जाता है ये आसन इस प्रकार हैं- ताड़ासन, गर्भासन, उत्तानपादासन गोरक्षासन, कोनासन, भुंगगासन, शवासन, पद्मासन, सिंहासन तथा वज्रासन आदि-
  18. यदि हिस्टीरिया की जगह किसी को मिर्गी के दौरे आते हों तो रोगी को 250 ग्राम बकरी के दूध में 50 ग्राम मेंहदी के पत्तों का रस मिलाकर नित्य प्रात: दो सप्ताह तक पीने से दौरे बंद हो जाते हैं-जरूर आजमाएं-
  19. READ MORE-  हिस्टीरिया क्या है What is Hysteria
Upcharऔर प्रयोग-
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हिस्टीरिया रोग के कुछ तथ्य यह है-Some Fact of Hysteria Disease

हिस्टीरिया रोग के कुछ तथ्य यह है-Some Fact of Hysteria Disease-


हिस्टीरिया(Hysteria)के रोगी को दिमाग के डॉक्टर के पास ले जाना चाहिए लेकिन बहुत से लोग हिस्टीरिया के दौरे को भूत-प्रेत का मामला मानते हैं पर इसके पीछे भी दिमागी कारण है अक्सर दोनों में होने वाले लक्षण एक ही जैसे होते हैं इसलिए लोग इसे उपरी हवा का प्रकोप समझ कर तांत्रिक की शरण लेते है-तान्त्रिको के द्वारा जो चिकित्सा की जाती है वो भी कुछ समय के लिए ही होती है पर भूत-प्रेत वाली स्थिति को भी हम हिस्टीरिया रोग के मामले मे केवल अंधविश्वास या झूठ नहीं मान सकते है रोगी इन लक्षणों को देखकर कहीं से किसी के दिए गए सुझाव को अपना लेता है-

Some Fact of Hysteria Disease

हिस्टीरिया रोग(Hysteria Disease)का दौरा उस समय नहीं होता है जब रोगी बिलकुल अकेला होता है और देखने में हिस्टीरिया रोगी बेहोश मालूम होता है लेकिन यह वास्तव में सच नहीं है जबकि रोगी को होश रहता है और यह भी देखने में आता है कि रोग अधिकतर कुंवारी लड़कियों को होता है और विवाहिताओं में केवल उन्हें होता है जो यौनतः अतृप्त होती हैं-

ज्यादातर सुंदर युवतियां भी इस रोग की शिकार होती हैं जिनके शरीर पर कोई दाग या खरोंच नहीं पड़ता है उनके नितंब और वक्ष अविकसित होते हैं रोग का वेग अस्थायी और कम समय का होता है इसका दौरा अधिकतर बेकार और निरुद्देश्य जीवन बीताने वालों को भी होता है लेकिन कुछ मामलों में कार्यव्यस्त जीवन बिताने वालों को भी होता है दौरे के समय सहानुभूति दिखलाने तथा प्यार करने और दुलारने से रोगी को प्रसन्नता मिलती है दौरे के उपरांत रोगी शर्म महसूस करता है रोगी की इच्छा शक्ति दुर्बल होती है और प्रेरित होने पर ही वह सक्रिय बन पाता है-

कुछ लोग सोचते हैं कि स्त्रियों के मन में यौन भावना को दबाने के कारण हिस्टीरिया रोग(Hysteria Disease)हो जाता है पर ये बिल्कुल ग़लत है माना ये एक दबाव हो सकता है पर बहुत सारे दबावों में से सिर्फ एक है केवल यौन भावना को दबा देना हिस्टीरियां के रोगियों के लिए सही बात नहीं होगी या फिर इसकी वजह से उन्हे ग़लत समझ लिया जाएगा जिससे उनको मानसिक तौर पर काफ़ी परेशानी सहनी पड़ती है जिसके कारण उनका रोग और भी बढ़ सकता है-

हिस्टीरिया रोग में रोगी के मन मे कोई दबी हुई इच्छा रह सकती है जिसे ना तो रोगी किसी को बता सकता है और ना ही मन मे दबा सकता है जैसे कि अगर बच्चें को अपने मां-बाप से कोई शिकायत है तो ना तो वो अपने मां-बाप से बोलकर बात ना मनवा सकते हैं और ना ही उनसे कुछ कह सकते हैं पर वो इस बात के दबाव मे आकर हिस्टीरिया रोग के शिकार हो जाते हैं-

ऐसे ही एक पति-पत्नी की आपस मे बनती नहीं है तो पत्नी ना तो अपने पति को समाज के मारे छोड़ सकती है और ना ही उसे कुछ कह सकती है इसी कारण वो मन ही मन मे कुढ़ते हुए हिस्टीरिया रोग की शिकार हो सकती है जहां बीमारी के बहाने उसका बैचेन मन एक ओर तो उसके पति से बदला लेने लगता है दूसरी ओर खुद ही उसके मन को राहत मिलने लगती है बैचेन मन की ये दबी हुई इच्छा उसको पूरी तरह यौन सन्तुष्टि ना मिलने के कारण भी हो सकती है और इसे लेकर मन की अपराधी भावना भी कि उसे ये इच्छा सताती ही क्यों है वह तो यह चाहती ही नहीं है ये भी हो सकती है-

भविष्य मे कुछ बनना या काबिल व्यक्ति को ऊंचा उठने की लालसा भी जब पूरी नहीं हो पाती है तो आर्थिक सामाजिक स्थितियां या कर्त्तव्य की कोई आवाज़ उन्हे रोकती है और ऐसे व्यक्ति मानसिक रूप से इस बाधा या अभाव को स्वीकार भी नहीं कर पाते तो अवचेतन मन को मौक़ा मिलता है किसी दूसरे रास्ते से इस दबी इच्छा या भावना को निकालने का तो वो भी इसका शिकार हो जाते है-

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हिस्टीरिया क्या है What is Hysteria

हिस्टीरिया क्या है-What is Hysteria


हिस्टीरिया(Hysteria)अवचेतन अभिप्रेरणा का परिणाम है अवचेतन अन्तर्द्वंध से चिंता उत्पन्न होती है और यह चिंता विभिन्न शारीरिक,शरीरक्रिया संबंधी एवं मनोवैज्ञानिक लक्षणों में परिवर्तित हो जाती है इस रोग लक्षण में बह्य लाक्षणिक अभिव्यक्ति पाई जाती है एक प्रकार से आप इसे इसे दिमागी बीमारी भी कह सकते हैं वैसे हिस्टीरिया(Hysteria)का रोग ज़्यादातर स्त्रियों को होने वाला एक दिमागी रोग होता है इसको स्त्रियों का मानसिक रोग भी कहा जाता है-

What is Hysteria

यह रोग पन्द्रह से पच्चीस साल की युवतियों में अधिक होता है हिस्टीरिया(Hysteria)रोग में स्त्रियों को मिर्गी के समान ही बेहोशी के दौरे आते हैं-

जब हिस्टीरिया((Hysteria)होता है तो इसमें रोगी अचेत अवस्था में पहुंच जाता है हिस्टीरिया रोग में सिर्फ रोगी को बेहोशी के दौरे ही नहीं पड़ते बल्कि कभी-कभी दूसरे लक्षण भी सामने आते हैं जैसे - हिस्टीरिया का दौरा पड़ने पर कुछ समय के लिए देखना और सुनना बन्द हो जाना या मुंह से आवाज़ ना निकलना और हाथ-पैरों का कांपना, शरीर का कोई भी हिस्सा बिल्कुल सुन्न पड़ जाना जैसा लकवे मे होता है- इसमें रोगी विभिन्न प्रकार की कुचेष्टायें यानी अजीब कार्य करने लगता है-

स्त्री-पुरुषों में अपने आप होती है अर्थात ऐसे स्त्री-पुरुष जिनमें यौन का आवेश दमित होता है-जैसे विवाह में विलंब होना या पति की पौरुषहीनता, तलाक, मृत्यु, गंभीर आघात, धन हानि, मासिक धर्म विकार, संतान न होना, गर्भाशय की बीमारियां, पति की अवेहलना या दुर्व्यवहार आदि कई कारणों से स्त्रियां इस रोग में ग्रस्त हो जाती हैं

इस रोग का वेग या दौरा सदा किसी दूसरे व्यक्ति की उपस्थिति में होता है एक बात सत्य है कि कभी किसी अकेली स्त्री को हिस्टीरिया(Hysteria)का दौरा नहीं पड़ता है- जिन स्त्रियों को यह विश्वास होता है कि उनका कोई संरक्षण, पालन, परवाह एवं देखभाल करने वाला है बस उन्हें ही यह रोग होता है- 

यदि इसके विपरीत,रोगी को विश्वास हो जाए कि किसी को उसकी चिंता नहीं है और कोई उसके प्रति सद्भावना-सहानुभूति नहीं रखता है और न कोई देखभाल करने वाला है तो उस स्त्री का यह रोग अपने आप ठीक हो जाता है-

आयुर्वेद के अनुसार ज्ञानवाही नाड़ियों में तमोगुण एवं वात तथा रूखेपन की वृद्धि हो कर चेतना में शिथिलता, अथवा निष्क्रियता आ जाने से यह रोग होता है- इस रोग की शुरुआत से पूर्व या रोग होने पर किसी अंग विशेष, स्नायु, वातवाहिनी में या अन्य कहीं क्या विकार हो गया है यह पता नहीं चलता-

हिस्टीरिया के लक्षण-Symptoms of Hysteria

  1. हिस्टीरिया रोग के होने पर रोगी स्त्री का जी मिचलाने लगता है तथा सांस कभी धीरे और कभी तेज चलने लगती है तथा बेहोशी छा जाती है और पीड़ित स्त्री के हाथ-पैर अकड़ने लगते हैं और उसके चेहरे की आकृति बिगड़ने लगती है-इस रोग से पीड़ित स्त्री अपने दिमाग पर काबू नहीं रख पाती है और अचानक हंसने लगती है और अचानक ही रोने लगती है-वह बिना किसी कारण से चिल्लाने लगती है और कोई-कोई रोगी इसमें मौन या चुप भी पड़ा रहता है-इस रोग से पीड़ित स्त्रियां कुछ बड़बड़ाने लगती है और दूसरों को मारने-पीटने लगती है और कभी चीख के साथ ज़मीन पर गिर जाती है-कभी बैठे-बैठे बेहोश होकर गिर पड़ती है-रोगी स्त्री को ऐसा लगता है कि वो कितनी ताकतवर है लेकिन दूसरे ही पल ऐसा महसूस होता है कि उसके शरीर में जान ही नहीं है-उसको परेशान करने वाली डकारें और हिचकी शुरू हो जाती है आवाज़ में ख़राबी पैदा हो जाती है पेशाब बन्द हो जाता है-
  2. इस रोग में पूरी तरह से बेहोश नहीं होती है तथा बेहोशी की हालत समाप्त हो जाने पर स्त्री को खुलकर पेशाब आता है- इस रोग की उत्पत्ति से पूर्व या आरम्भ में हृदय में पीड़ा, जंभाई, बेचैनी आदि लक्षण भी होते हैं- इस रोग से पीड़ित स्त्री को सांस लेने में कठिनाई, सिर, पैर, पेट और छाती में दर्द, गले में कुछ फंस जाने का आभास, शरीर को छूने मात्र से ही दर्द महसूस होता है, आलसी स्वभाव, मेहनत करने में बिल्कुल भी मन ना करना, रात में बिना बात के जागना, सुबह देर तक सोते रहना, भ्रम होना, पेट में गोला सा उठकर गले तक जाना, दम घुटना, थकावट, गर्दन का अकड़ना, पेट में अफारा होना, डकारों का अधिक आना और हृदय की धड़कन बढ़ जाना, साथ ही लकवा और अंधापन हो जाना आदि हिस्टीरिया के लक्षण हैं- 
  3. इस रोग से पीड़ित स्त्री को प्रकाश की ओर देखने में परेशानी होने लगती है जब स्त्री को इस रोग का दौरा पड़ता है तो उसका गला सूखने लगता है और वह बेहोश हो जाती है-
  4. इस रोग के कोई निश्चित लक्षण नही होते जिससे यह कहा जा सके कि रोग हिस्टीरिया ही है-अलग-अलग समय अलग-अलग लक्षण होते हैं किन्हीं दो रोगियों के एक से लक्षण नहीं होते-रोगी जैसी कल्पना करता है वैसे ही लक्षण दिखाई पड़ते हैं- 

  5. साधारणतः रोगी बिना कारण या बहुत मामूली कारणों से हंसने या रोने लगता है प्रकाश या किसी प्रकार की आवाज उसे अप्रिय लगते हैं सिर, छाती, पेट, शरीर की संधि, रीढ़ तथा कंधों की मांसपेशियों में काफी वेदना होने लगती है प्रायः दौरे से पहले रोगी चीखता ,किलकारी भरता है तथा उसे लगातार हिचकियां आती रहती हैं और  मूर्च्छा में रोगी के दांत भी भिंच सकते है-
  6. हिस्टीरिया रोग कई कारणों की वजह से होता है-हिस्टीरिया के रोग का कारण अधिक चिंता और मानसिक तनाव होता है- स्त्रियों को हिस्टीरिया का रोग किसी तरह के सदमे, चिन्ता, प्रेम में असफलता, मानसिक दु:ख और किसी दुख का गहरा आघात होने से अधिक होता है 
  7. स्त्रियों की यौन-उत्तेजना बढ़ने के कारण भी हिस्टीरिया(Hysteria)रोग के लक्षण पैदा हो जाया करते हैं बहुत सी स्त्रियों को जरायु (गर्भावस्था) में विकार या गर्भाशय या डिम्बकोष में गड़बड़ी होने के कारण भी हिस्टीरिया रोग हो जाया करता है स्नायु-मंडल की क्रिया में किसी तरह के विकार(स्नायुविक कमज़ोरी) उत्पन्न होने के कारण से भी यह रोग हो सकता है किसी तरह के अपने मनोभावों को व्यक्त न कर पाने के कारण भी यह गुल्मवायु या हिस्टीरिया रोग हो जाता है-
  8. मासिक स्राव का सही समय पर न होना या मासिक स्राव होने के समय बहुत अधिक कष्ट(दर्द)होना, विवाह के लिए उम्र हो जाने पर भी युवती की शादी न होने पर,सेक्स क्रिया करते समय पूरी तरह से संतुष्ट न होने पर, योनि और गर्भाशय के अंदर सूजन आदि के रोग होने से तथा डर, दिमागी आघात, शोक और शरीर की कमज़ोरी की वजह से भी हिस्टीरिया का रोग अधिकतर स्त्रियों को हो जाता है तथा यह रोग उन स्त्रियों को भी हो जाता हो, जो विधवा हो जाती है तथा उन शादीशुदा स्त्रियों को भी यह रोग हो जाता है जिनके पति विदेश चले जाते हैं-
  9. अगर हिस्टीरिया(Hysteria)रोगी के साथ कोई बड़ी दुर्घटना हुई है और वह उसे भुलाने की कोशिश कर रहा हो पर न भुला पाए तो भी उसे हिस्टीरिया का रोग हो सकता है अगर किसी युवती को संभोग करने की इच्छा होती है और बार-बार किसी कारण से उसे अपनी इस इच्छा को दबाना पड़ता हो तथा जिनकी संभोग(सेक्स की इच्छा पूरी नहीं होती)के प्रति इच्छा पूर्ण नहीं होती है और वह हीनभावना से ग्रस्त हो जाती है तो उसे हिस्टीरिया का रोग हो सकता है-
  10. हिस्टीरिया रोग दूसरे कई रोगों के के कारण भी हो सकता है जैसे- कब्ज बनना, मासिक धर्म संबन्धी कोई आदि-इसके अलावा वैवाहिक जीवन में पति-पत्नी के बीच अक्सर नोक-झोंक लगी रहना भी हिस्टीरिया रोग का कारण हो सकता है तथा जो अपने पति से कलेश या नफरत करती है-
  11. लोग हिस्टीरिया और मिर्गी के दौरे मे अन्तर नहीं समझ पाते है मिर्गी के दौरे में रोगी को अचानक दौरा पड़ता है-रोगी कहीं पर भी रास्ते में, बस में, घर पर गिर जाता है, उसके दांत भिंच जाते हैं जिससे उसके होठ और जीभ भी दांतों मे आ जाते हैं जबकि हिस्टीरिया रोग मे ऐसा नहीं होता है रोगी को हिस्टीरिया का दौरा पड़ने से पहले ही महसूस हो जाता है और वो कोई सुरक्षित सा स्थान देखकर वहां पर लेट सकता है उसके दांत भिचने पर होठ और जीभ दांतों के बीच मे नहीं आती है पर हाथ-पैरों का अकड़ना दोनों ही मे एक ही जैसा होता है लेकिन मिर्गी के दौरे का समय अनिश्चित नहीं होता है हिस्टीरिया में ये कम या ज़्यादा हो सकता है-
  12. हिस्टीरिया में लक्षण भी बदलते रहते हैं हिस्टीरिया के रोगी को अमोनिया आदि सुंघाने पर दौरा खुलकर दुबारा भी आ सकता है लेकिन रोगी को दौरा आने पर ज़्यादा परेशान करना या छेड़ना ठीक नहीं है यह दौरा खुलकर दोबारा भी आ सकता है रोगी को दौरे के समय ज़्यादा परेशान नहीं करना चाहिए तथा दौरा पड़ने पर रोगी के कपड़े ढीले कर देने चाहिए और उसके शरीर को हवा लगने दें-जैसे-जैसे दौरा खत्म होगा तो रोगी खुद ही धीरे-धीरे खड़ा हो जाएगा और कमज़ोरी महसूस होने पर रोगी को गर्म चाय या कॉफी पिला सकते हैं पर ये इलाज कुछ समय के लिए ही होता है-
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हर्निया है तो करे ये उपाय - Harniya Hai To Kare Ye Upaay

हर्निया है तो करे ये उपाय-Harniya Hai To Kare Ye Upaay-


मनुष्य के शरीर के कुछ अंग शरीर के अंदर खोखले स्थानों में स्थित है जिसे देहगुहा(body cavity)कहते हैं देहगुहा चमड़े की झिल्ली से ढकी रहती है इन गुहाओं की झिल्लियाँ कभी-कभी फट जाती हैं और अंग का कुछ भाग बाहर निकल आता है इस प्रकार की विकृति को हर्निया(Hernia)कहते हैं झिल्ली के फटने से जब कोई अंग या आंत बाहर की तरफ आने से वहां एक उभार हो जाता है जिसे आसानी से देखा जा सकता है-

Harniya Hai To Kare Ye Upaay

लंबे समय से खांसते रहने या लगातार भारी सामान उठाने से भी पेट की मांसपेशियां(Muscles)कमजोर हो जाती है ऐसी स्थिति में हर्निया(Harniya)की संभावना बढ़ जाती है इसके कोई खास लक्षण नहीं होते हैं लेकिन कुछ लोग सूजन और दर्द का अनुभव करते हैं जो खड़े होने पर और मांसपेशियों में खिंचाव होने या कुछ भारी सामान उठाने पर बढ़ सकता है-

ये समस्या जन्मजात भी हो सकती है इसे कॉनजेनाइटल हर्निया कहते हैं हर्निया एक वक्त के बाद किसी को भी हो सकता है और बिना सर्जरी के ठीक भी नहीं हो सकता इसमें पेट की त्वचा के नीचे एक असामान्य उभार आ जाता है जो नाभि के नीचे होता है आंत का एक हिस्सा पेट की मांसपेशियों के एक कमजोर हिस्से से बाहर आ जाता है इसके अलावा इंगुइंल हर्निया, फेमोरल हर्निया, एपिगास्त्रिक हर्निया, एम्ब्लाइकल हर्निया भी होता है जो बहुत कम दिखता है-

प्रारम्भिक अवस्था की हर्निया की बीमारी में कपड़ा या बेल्ट बांधकर धीरे धीरे प्राणायाम करें धीरे धीरे प्राणायाम करने से हर्निया में लाभ होता है बाह्य प्राणायाम  सबसे अधिक लाभदायक होता है . पूरा श्वास बाहर निकालकर कुछ क्षण  पेट को ऐसे ही रखें  फिर धीरे धीरे श्वास अन्दर लें तथा पीछे झुकने वाले आसन न करें--

एक योग बनाएं-

अमरुद के पत्ते- चार-पांच 
युक्लिप्ट्स के  पत्ते- चार या पांच 
आम के  पत्ते- चार या पांच 

इन सभी को मिलाकर कूटकर इनका काढ़ा पीयें  इससे आँतों की झिल्ली मजबूत हो जाती है-

उपचार-

  1. कांचनार गुग्ग्लु या वृद्धि बाधिका वटी और सर्वक्ल्प क्वाथ आदि का प्रयोग किया जा सकता है लेकिन ज्यादा हर्निया बढने पर आपरेशन ही करना पड़ता है-
  2. यदि हर्निया के लक्षण पता लगे तो आप उसे घरेलू इलाज से कम कर सकते हैं हालांकि इन घरेलू उपायों से सिर्फ प्राथमिक इलाज ही संभव है और इसे आजमाने पर कभी उल्टे परिणाम भी हो सकते हैं इसलिए घरेलू इलाज आजमाने से पहले डॉक्टर से जरुर संपर्क कर लें-
  3. Marshmallow
  4. मार्श मैलो(Marshmallow)एक जंगली औषधि है जो काफी मीठी होती है इसके जड़ के काफी औषधीय गुण हैं यह पाचन को ठीक करता है और पेट-आंत में एसिड बनने की प्रक्रिया को कम करता है हर्निया में भी यह काफी आराम पहुंचाता है-
  5. बबूने का फूल(Chamomile)पेट में हर्निया आने से एसिडिटी और गैस काफी बनने लगती है इस स्थिति मेंम बबूने के फूल के सेवन से काफी आराम मिलता है यह पाचन तंत्र को ठीक करता है और एसिड बनने की प्रक्रिया को कम करता है-

  6. अदरक के जड़(Ginger Root)पेट में गैस्ट्रिक एसिड और बाइल जूस से हुए नुकसान से सुरक्षा करता है यह हर्निया से हुए दर्द में भी काम करता है-
  7. हर्निया के दर्द में एक्यूपंक्चर काफी आराम पहुंचाता है खास नर्व पर दबाव से हर्निया का दर्द कम होता है-
  8. मुलैठी (Licorice)कफ, खांसी में मुलैठी तो रामबाण की तरह काम करता है और आजमाय हुआ भी है हर्निया के इलाज में भी अब यह कारगर साबित होने लगा है खासकर पेट में जब हर्निया निकलने के बाद रेखाएं पड़ जाती है तब इसे आजमाएं-
  9. बर्फ से हर्निया वाले जगह दबाने पर काफी आराम मिलता है और सूजन भी कम होती है यह सबसे ज्यादा प्रचलन में है-
  10. हावथोर्निया(Hawthornia)एक हर्बल सप्लीमेंट है जो पेट की मांसपेशियों को मजबूत बनाती है और पेट के अंदर के अंगों की सुरक्षा करती हैयह हर्निया को निकलने से रोकने में काफी कारगर है हावथोर्निया में Citrus Seed, Hawthorn और Fennel मिली होती है-

हर्निया में इससे बचे-

  1. शराब पीना पूरी तरह बंद कर दें तथा हर्निया में ज्यादा तंग और टाइट कपड़ें नहीं पहनें-
  2. हर्निया में कसरत करने से परहेज करें-
  3. बेड पर अपने तकिए को 6 इंच उपर रखें ताकि पेट में सोते समय एसिड और गैस नहीं बन पाए-
  4. प्रभावित जगह को कभी भी गर्म कपड़े या किसी भी गर्म पदार्थ से सेंक नहीं दें-
  5. एक ही बार ज्यादा मत खाएं थोड़ी-थोड़ी देर पर हल्का भोजन लें तथा खाने के तुरंत बाद झुकें नहीं-
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Upcharऔर प्रयोग-
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प्रसवोत्तर मालिश कराने से पहले Postpartum Massage Before First

प्रसवोत्तर मालिश कराने से पहले Postpartum Massage Before First-


प्रसवोत्तर मालिश(Postpartum Massage)में निपुण बहुत सी मालिशवालियां सामान्यत: घर पर आकर ही मालिश करती हैं आप अपने मौहल्ले या कॉलोनी या फिर नजदीकी ब्यूटी पार्लर से आपके क्षेत्र की अच्छी मालिशवाली के बारे में पता कर सकती हैं तथा शिशु के पास रहकर ही घर पर आराम से मालिश के फायदे उठा सकती हैं-

Postpartum Massage Before First

कुछ बातें ध्यान रक्खें-


  1. Postpartum Massage(प्रसवोत्तर मालिश) में निपुण मालिश वाली को आप पूरे 40 दिन के पैकेज के लिए या फिर प्रतिदिन के हिसाब से कीमत के बारे मोल-भाव भी कर सकती हैं लेकिन उसके बारे में दूसरे लोगों से पता कर लें और उससे वैध पहचान पत्र ले लें-
  2. जब आपको मालिश करवानी हो तो अपने पति-माँ-सास या परिवार के किसी अन्य विश्वसनीय सदस्य से शिशु की देखभाल के लिए मदद अवस्य लें लें या फिर मालिश तब करवाएं जब आपका शिशु सो रहा हो-
  3. अधिक लाभ आपको चिंतामुक्त होकर मालिश कराने में ही मिलेगा इसलिए मालिश करवाते समय आप किसी भी बारे में चिंता नहीं करें-
  4. शिशु को दूध पिलाने और उसकी नैपी और कपड़े बदलने के तुरंत बाद ही मालिश करवाना शुरु करें फिर वह एक या दो घंटे तक आपसे कुछ नहीं चाहेगा-
  5. प्रसवोपरांत 14 सप्ताह के अंदर ही स्कार टिशू मालिश शुरु करने का सही समय होता है लेकिन अगर आपका सीजेरियन हुआ है तो फिर मालिश शुरु करवाने से पहले आप घाव को भर जाने दें इसमें करीब एक या दो सप्ताह का समय लगेगा मगर आपका शरीर मालिश के लिए तैयार है या नहीं तो इस बारे में पहले अपनी डॉक्टर से सलाह अवश्य ले लें-

  6. मालिशवाली को अपने घाव और पेट पर मालिश न करने के निर्देश पहले ही दे दें क्युकि प्रसव के बाद इतनी जल्दी उस क्षेत्र पर दबाव डालने से आपको समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं इसलिए तब तक पैरों-सिर और पीठ की मालिश तक ही सीमित रहना सुरक्षित रहता है-
  7. घाव की मालिश आपके ऊत्तकों को आपस में चिपकने से बचा सकती है क्युकि आॅपरेशन के बाद ऊत्तकों का आपस में चिपकना काफी आवश्यक है इसलिए घाव को अवश्य बचाये-
  8. मालिश करवाना नुकसानदेह भी हो सकता है यदि आपको त्वचा की समस्याएं जैसे कि चकत्ते, छाले, फोड़े या छाजन(एग्जिमा) है या फिर आपके साथ कोई चिकित्सकीय जटिलता हैअथवा आपका रक्तचाप(ब्लड प्रेशर)उच्च रहता है या फिर आपको हर्निया है ऐसे में हल्की मालिश ज्यादा उपयुक्त रहेगी अथवा अपने चिकित्सक की राय लें लें-
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Upcharऔर प्रयोग-
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प्रसवोत्तर मालिश से होने वाले लाभ Benefits from Postpartum Massage

प्रसवोत्तर मालिश से होने वाले लाभ Benefits from Postpartum Massage-


शिशु के जन्म के बाद माँ(जच्चा)के पूरे शरीर की रोजाना लगभग चालीस दिनों तक मालिश की जाती है इसे ही प्रसवोत्तर मालिश(Postpartum Massage)कहा जाता है आजकल इसका अभाव होता जा रहा है लेकिन शायद आपको नहीं पता है कि इसके कितने लाभ हुआ करते थे-

Benefits from Post Partum Massage

ऐसी बहुत सी मालिशवाली बाई हैं जो प्रसव के बाद की मालिश और नवजात शिशु की मालिश में पूर्णतया निपुण होती हैं तथा वे रोजाना प्रसवोपरांत शुरुआती दिनों में एक बार आपके घर मालिश करने के लिए आती हैं वे आमतौर पर पहले पैरों से मालिश करना शुरु करती हैं और फिर शरीर के ऊपरी हिस्सों की ओर जाते हुए सिर की मालिश से समाप्त करती हैं-

प्रसवोत्तर की मालिश(Postpartum Massage)जच्चा को आराम पहुंचाने की एक पुरानी परंपरा है नवजात शिशु के घर में आ जाने की व्यस्तता के बीच यह मालिश शिशु की माँ के लिए काफी आरामदायक होती है मगर इसके लिए घर के अन्य लोगों को भी सहयोग देने की आवश्यकता होती है क्युकी नवजात शिशु के साथ-साथ  शिशु की माँ की मालिश के लिए पूरा एक घंटा निकालना पड़ता है आपके घर में इस मालिश के समय शिशु की दादी-नानी या फिर कोई अन्य विश्ववसनीय व्यक्ति शिशु की देखरेख कर सके तब तो आप चिंतामुक्त हो सकती हैं इस प्रकार प्रसवोत्तर की मालिश(Postpartum Massage)करवाना प्रसव के बाद एकांतवास की सबसे अच्छी परंपरा महसूस होगी-

प्रसवोत्तर की मालिश(Postpartum Massage)फायदे-


  1. शिशु के जन्म की पूरी प्रक्रिया से आपके शरीर पर काफी जोर पड़ता है जिसमे खासकर कि पेट,पीठ के निचले हिस्से और कूल्हों पर और शरीर में जिन जगहों पर दर्द है वहां मालिश से आराम मिलता है तथा साथ ही मांसपेशियों का कसाव भी कम होता है-
  2. अगर आप सही अवस्था में शिशु को स्तनपान नहीं करवाती हैं तो आपकी पीठ में ऊपर की तरफ भी दर्द हो सकता है प्रसवोत्तर की मालिश(Postpartum Massage)आपके लिए काफी लाभदायक है-
  3. मालिश से मांसपेशियों में रक्त और आॅक्सीजन का प्रवाह बढ़ता है जिससे शिशु की माँ के विषैले तत्व शरीर से बाहर निकलते हैं-

  4. मालिश आपके शरीर को एंडोर्फिन बनाने के लिए प्रोत्साहित करती है यह प्राकृतिक दर्द निवारक और अच्छा महसूस कराने वाला हॉर्मोन है जो दिमाग से निकलता है जिससे आप काफी आराम महसूस कर सकती है-
  5. अगर आपका सीजेरियन आॅपरेशन हुआ है तो भी ये मालिश आपको जल्दी ठीक होने में मदद करती है हालांकि, जब तक घाव पूरी तरह भर नहीं जाता है तब तक इस पर मालिश न कराएं हाँ-ठीक होने के बाद उस क्षेत्र पर हल्के हाथों से मालिश करने से रक्त आपूर्ति बढ़ती है और आंतरिक घाव ठीक होने में भी मदद मिलती है-
  6. आपके शरीर की मालिश शरीर को आॅक्सीटॉसिन जारी करने में भी आपकी मदद करती है ये आॅक्सीटॉसिन लेट डाउन रिफ्लेक्स को सक्रिय करता है जिससे आपके स्तनों से दूध निकलता है इसका मतलब आपको समझ आ गया होगा कि मालिश के दौरान आपके स्तन से दूध का थोड़ा रिसाव हो सकता है इसलिए ब्रेस्टपैड लगाकर अपनी स्तनपान वाली विशेष ब्रा पहने रखें-
  7. स्तनों की मालिश से अवरुद्ध नलिकाओं को खुलने और गांठों या कठोर जगहों के ढीला होने में भी मदद मिलती है तथा साथ ही यह स्तनों की सूजन(मैस्टाइटिस)के खतरे को भी कम करता है हालांकि-स्तनों पर बलपूर्वक मालिश करने से इन्हें नुकसान भी पहुंच सकता है इसलिए ध्यान रखें कि स्तनों पर हल्के हाथों से ही मालिश की जाए-
  8. लसिका प्रवाह को उत्तेजित कर सेहत और प्रतिरक्षण क्षमता को बेहतर बनाता है तथा बेबी ब्ल्यूज और प्रसवोत्तर अवसाद का सामना करने में सहायता मिलती है विशेषज्ञ का भी मानना है कि मालिश आपके तनाव को दूर करने और मनोदशा को बेहतर करने का उत्कृष्ट तरीका है-
  9. आप माने या न माने बस इतना तो माने कि प्रसवोत्तर मालिश आपको कुछ समय अकेला रहने का अवसर तो देगा और यह अंतराल आपको शिशु और घर की कई जरुरतें पूरी करने की शक्ति प्रदान करेगा या फिर यह आपको भी तनाव मुक्त होकर सोने में मदद करेगी-ताकि आप भी अपने शिशु के साथ थोड़ी झपकी ले सकें-
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Upcharऔर प्रयोग-
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गाय का मूत्र गाय के दूध की तुलना में महंगा है Expensive than Extracts of Cow Urine Cow Milk

गाय का मूत्र गाय के दूध की तुलना में महंगा है Expensive than Extracts of Cow Urine Cow Milk-


गाय का दूध अगर सौ बीमारियों का निदान करता है तो गोमूत्र(Extracts of cow urine)कैंसर सहित 108 बीमारियों में लाभकारी माना जाता है आज इसकी कीमत दूध से कहीं अधिक हो गई है धार्मिक तौर पर भी पूजा-पाठ के लिए बेहद शुद्ध माना जाने वाले गाय के दूध से गोमूत्र की उपयोगिता ज्यादा है  और वास्तव में इसकी उपयोगिता वो ही समझ सकते हैं जो बीमारी के निदान के लिए गोमूत्र अर्क(Extracts of cow urine)का सेवन करते हैं-

Expensive than Extracts of Cow Urine Cow Milk


आज स्थिति यह कि 120 रुपये लीटर की कीमत पर भी गोमूत्र अर्क नहीं मिल रहा है गोमूत्र अर्क की बढ़ती मांग के चलते प्रदेश भर की गोशालाओं में इसे बड़े स्तर पर तैयार किए जाने की कवायद हो चुकी है इसके तहत प्रदेश भर की करीब 150 गोशालाओं में गोमूत्र का अर्क(Extracts of cow urine)बड़ी मात्रा में तैयार किया जाएगा- गोमूत्र अर्क की खरीदारी में पतंजलि योग समिति ने भी बड़े स्तर पर गोशालाओं से मांग कर ली है-मांग पूर्ति के लिए हिसार के लाडवा, भिवानी व कुरुक्षेत्र जिले में आयुर्वेद के रूप में प्रयोग हो रहे गोमूत्र अर्क को इलेक्ट्रोनिक संयंत्र से तैयार किया जा रहा है-

आयुर्वेद के अनुसार गोमूत्र, लघु अग्निदीपक, मेघाकारक, पित्ताकारक तथा कफ और बात नाशक है और अपच एवं कब्ज को दूर करता है-इसका उपयोग प्राकृतिक चिकित्सा में पंचकर्म क्रियाएं तथा विरेचनार्थ और निरूहवस्ती एवं विभिन्न प्रकार के लेपों में होता है- आयुर्वेद में में संजीवनी बूटी जैसी कई प्रकार की औषधियां गोमूत्र से बनाई जाती हैं- गौमूत्र के प्रमुख योग गोमूत्र क्षार चूर्ण कफ नाशक तथा मेदोहर अर्क मोटापा नाशक हैं-

गोमूत्र- श्वांस, कास, शोध, कामला, पण्डु, प्लीहोदर, मल अवरोध, कुष्ठ रोग, चर्म विकार, कृमि, वायु विकार मूत्रावरोध, नेत्र रोग तथा खुजली में लाभदायक है- गुल्य, आनाह, विरेचन कर्म, आस्थापन तथा वस्ति व्याधियों में गोमूत्र का प्रयोग उत्तम रहता है-

गोमूत्र अग्नि को प्रदीप्त करता है क्षुधा [भूख] को बढ़ाता है अन्न का पाचन करता है एवं मलबद्धता को दूर करता है-

गोमूत्र से कुष्ठादि चर्म रोग भी दूर हो सकते हैं तथा कान में डालने से कर्णशूल रोग खत्म होता है और पाण्डु रोग को भी गोमूत्र समाप्त करने की क्षमता रखता है- इसके अलावा आयुर्वेदिक औषधियों का शोधन गोमूत्र में किया जाता है और अनेक प्रकार की औषधियों का सेवन गोमूत्र के साथ करने की सलाह दी जाती है- आयुर्वेद में स्वर्ण, लौह, धतूरा तथा कुचला जैसे द्रव्यों को गोमूत्र से शुद्ध करने का विधान है- गोमूत्र के द्वारा शुद्धीकरण होने पर ये द्रव्य दोषरहित होकर अधिक गुणशाली तथा शरीर के अनुकूल हो जाते हैं-

रोगों के निवारण के लिए गोमूत्र का सेवन कई तरह की विधियों से किया जाता है जिनमें पान करना, मालिश करना, पट्टी रखना, एनीमा और गर्म सेंक प्रमुख हैं-

किस प्रकार बनता है गोमूत्र अर्क(Extracts of cow urine) आइये जाने-

भट्ठी पर एक बड़ा मटका गोमूत्र से भरकर रख दिया जाता है भट्ठी के ताप से गर्म होते गोमूत्र को वाष्प के जरिये बाहर निकालने के लिए मटके में एक ओर छोटा सा सुराग निकालकर पाइप के माध्यम से एक बर्तन में छोड़ दिया जाता है-एक-एक बूंद बर्तन में जमा होती रहती है जिसे गौमूत्र अर्क कहा जाता है सात लीटर गाय के मूत्र में करीब एक लीटर के आसपास अर्क निकलता है-इसे बोतलों में डालकर बेचा जाता है-

गोमूत्र के लिए बिल्कुल स्वस्थ बछड़ी को चुना जाता है इसके लिए केवल देसी नस्ल की गायों का मूत्र लिया जाता है- खूंटे से बंधी गाय की अपेक्षा  खुले में घूम कर भिन्न-भिन्न प्रकार का खाद्य चरने वाली गाय को अर्क के लिए ज्यादा महत्व दिया जाता है-

गोमूत्र(Extracts of cow urine)से बने अन्य उत्पाद-


आयुर्वेद के अलावा गोमूत्र नील, हैंड वाश, शैंपू, नेत्र ज्योति, घनवटी, सफेद फिनाइल, कर्णसुधा सहित कई उत्पाद बनाने में प्रयोग किया जाता है-

बाबा रामदेव ने 150 गोशालाओं से की अर्क की मांग-

हरियाणा राज्य गोशाला संघ के कार्यकारी प्रधान शमशेर सिंह आर्य ने कहा कि गोमूत्र अर्क की मांग अत्याधिक बढ़ रही है इसको देसी भट्ठियों से तैयार अर्क को पूरा नहीं किया जा सकता है - देसी फार्मूले से अर्क निकालने के बजाए अब कई गोशालाओं में इलेक्ट्रोनिक संयंत्र प्रयोग किए जा रहे हैं- बाजार में 12 हजार रुपये कीमत का यह उपकरण संघ द्वारा गोशालाओं को 65 सौ रुपये में मुहैया कराया जाता है- आर्य ने बताया कि बाबा रामदेव की पतंजलि योग समिति आगामी समय में 150 गोशालाओं से तैयार अर्क खरीदेगी-

हर रोग की दवा गौमूत्र(Extracts of cow urine)-

अर्क का उपयोग मुख्यत: यकृत के रोग,चर्म के रोग,पेट के रोग,हृदय के रोग,गुप्त रोगों व श्वासं के रोगों में किया जाता है-यह सभी तरह के रोगों में लाभप्रद है -

गौमूत्र ही एक ऐसा द्रव्य है जिसमें अनेक रोगों से लड़ने की शक्ति समाहित है 

गौमूत्र अर्क-यह लघु,रूक्ष,तीक्ष्ण,रस में कटु लवण,विपाक में कटु और उष्ण वीर्य वाला होता है-

इसमें ताम्बें का अशं होता है जो शरीर में स्वर्ण तत्व में परिवर्तित हो जाता है-इससे रोगों से लड़ने की क्षमता में खासी बढ़ोतरी होती है-गौमुत्र पीने या उसमें तीन दिन रखने से विष मुक्त हो जाता है-

गौमूत्र(Extracts of cow urine)एक तरह का रासायनिक संगठक है 1500 सीसी गौमूत्र में ठोस पदार्थ 60 ग्राम व 1440 ग्राम द्रव भाग होता है-

60 ग्राम ठोस पदार्थ में 35 ग्राम सेन्द्रिय व 25 ग्राम निनिन्द्रिय पदार्थ होते है गौमूत्र का मुख्यसंगठक जल,यूरिया,सोडियम,पोटेशियम,क्लोराइड,अम्ल,क्षार व लवण होते है-

गौमूत्र अर्क में अद्भुत शक्ति समाहित है इसके सेवन से पेट के रोगों के अलावा शरीर के अन्य गंभीर रोगों से भी निजात मिल सकती है-

गौमूत्र(Extracts of cow urine)कैंसर में फायदेमंद-

कैंसर की चिकित्सा में रेडियो एक्टिव एलिमेन्ट प्रयोग में लाए जाते है -

गौमूत्र में विद्यमान सोडियम,पोटेशियम,मैग्नेशियम,फास्फोरस,सल्फर आदि में से कुछ लवण विघटित होकर रेडियो एलिमेन्ट की तरह कार्य करने लगते है और कैंसर की अनियन्त्रित वृद्धि पर तुरन्त नियंत्रण करते है तथा कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करते है-अर्क आँपरेशन के बाद बची कैंसर कोशिकाओं को भी नष्ट करता है यानी गौमूत्र में इस लााइलाज बीमारी को दूर करने की शक्ति समाहित है-

गौमूत्र सेवन विधि-

दर्द में गौमूत्र अर्क की मालिश भी की जाती है-

प्रतिशयाय,सिर दर्द में नस्य के रूप में प्रयोग होता है-

एनिमा में भी इसका प्रयोग होता है-

गौमूत्र अर्क 5-10 एमएल 100 एमएल पानी में मिलाकर भूखे पेट पीना चाहिए-

गोमूत्र अर्क पीने के आधा घंटे बाद दुध या भोजन लेना चाहिए-

सावधानियाँ-

गौमूत्र अर्क देशी नस्ल की गाय के मूत्र से बना हुआ होना चाहिए तथा बछडी के गौमूत्र से बना अर्क सर्वश्रेष्ठ होता है-बछडी रोगी या गर्भवती नहीं हो-

Upcharऔर प्रयोग-
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दांतों के मवाद का घरेलू उपचार Home Remedies for Teeth Pus

दांतों के मवाद का घरेलू उपचार Home Remedies for Teeth Pus-


दांतों में पस(Teeth Pus)पड़ने का मुख्य कारण मसूड़ों में जलन और टूटे हुए दांत के कारण होता है दांतों में पस(Teeth Pus)मुख्य रूप से एक प्रकार का संक्रमण होता है जो मसूड़ों और दांतों की जड़ों के बीच होता है इसके कारण दांत के अंदर पस बन जाता है जिसके कारण दांत में दर्द होता है- 

Home Remedies for Teeth Pus

जिस दांत में पस(Teeth Pus)हो जाता है उसमें बैक्टीरिया प्रवेश कर जाता है और वही बढ़ता रहता है जिससे उन हड्डियों में संक्रमण हो जाता है जो दांतों को सहारा देती हैं यदि समय पर इसका उपचार नहीं किया गया तो इसके कारण जीवन को खतरा हो सकता है

दांतों में पस(Teeth Pus)होने के कारण जो दर्द होता है वह असहनीय होता है तथा इस दर्द को रोकने के लिए लोग कई तरह के उपचार करते हैं परंतु अंत में दर्द बढ़ जाता है-

यदि आप भी मसूड़ों की इस बीमारी से ग्रसित हैं तो आपको क्या करना चाहिए तथा क्या नहीं इस पर थोडा प्रकाश डालने से पहले आपको इस बीमारी के लक्षण तथा कारण पहचानने होंगे-दांतों में पस होने के कारण मसूड़ों की बीमारी मुंह की सफाई ठीक से न करना प्रतिरक्षा प्रणाली कमज़ोर होना टूटा हुआ दांत मसूड़ों में सूजन और जलन दांतों में संक्रमण बैक्टीरिया कार्बोहाइड्रेट युक्त तथा चिपचिपे पदार्थ अधिक मात्रा में खाना आदि होता है-

दांतों में पस(Teeth Pus)होने पर उपचार-

  1. जब भी आप कुछ खाएं तो संक्रमित जगह पर दर्द संवेदनशील दांत मुंह में गंदे स्वाद वाले तरल पदार्थ का स्त्राव साँसों में बदबू मसूड़ों में लालिमा और दर्द अस्वस्थ महसूस करना मुंह खोलने में तकलीफ होना प्रभावित क्षेत्र में सूजन-
  2. लहसुन बैक्टीरिया को मारने के लिए एक प्राकृतिक हथियार है कच्चे लहसुन का रस संक्रमण को मारने में मदद करता है यदि वास्तव में आपके दांत में बहुत अधिक दर्द हो रहा हो तो फिर आप ऐसा कर सकते हैं कि कच्चे लहसुन की एक कली लें और इसे पीसें और निचोड़कर इसका रस निकालें तथा इस रस को मसूड़े के उस प्रभावित क्षेत्र पर लगायें-यह घरेलू उपचार दांत के दर्द में जादू की तरह काम करता है-
  3. लौंग का तेल भी संक्रमण रोकने में सहायक होता है तथा दांतों के दर्द में तथा मसूड़ों की बीमारी में अच्छा उपचार है आप थोड़ा सा लौंग का तेल लें तथा तथा इस तेल से धीरे-धीरे ब्रश करें-जब आप प्रभावित क्षेत्र में इसे लगायें तो अतिरिक्त सावधानी रखें इस पर बहुत अधिक दबाव न डालें तथा अपने मसूड़ों पर धीरे धीरे मालिश करें अन्यथा अधिक दर्द होगा या फिर आप अपनी ऊँगली से मसूड़ों पर लौंग के तेल की कुछ मात्रा लगायें तथा धीरे धीरे मालिश करें-
  4. आईल पुलिंग यह एक घरेलू उपचार बहुत ही सहायक है इसमें आपको सिर्फ नारियल के तेल की आवश्यकता होती है आप एक टेबलस्पून(चम्मच)नारियल का तेल लें और इसे अपने मुंह में चलायें बस इसे निगले नहीं तथा इसे लगभग 30 मिनिट तक अपने मुंह में रखें रहें फिर आप इसे थूक दें और मुंह धो लें-आपको निश्चित रूप से आराम मिलेगा-
  5. दांत के दर्द में पेपरमिंट आईल जादू की तरह काम करता है आप अपनी उँगलियों के पोरों पर कुछ तेल लें तथा इसे धीरे धीरे प्रभावित क्षेत्र पर मलें इससे आपको दांत के दर्द से तुरंत आराम मिलेगा-

  6. दांतों में पस होने पर ऐप्पल सीडर विनेगर(सेब का सिरका) एक अन्य प्रभावशाली उपचार है चाहे वह प्राकृतिक हो या ऑर्गेनिक, यह बहुत अधिक प्रभावशाली है-एक टेबलस्पून ए सी वी लें-इसे कुछ समय के लिए अपने मुंह में रखें और फिर इसे थूक दें-इसे निगलें नहीं- इससे प्रभावित क्षेत्र रोगाणुओं से मुक्त हो जाएगा-इससे सूजन भी कम होती है-

चमकते सफेद दांतों के लिए क्‍या करें और क्‍या न करें-

आप जितना मुश्किल समझते है उससे कहीं ज्‍यादा आसान होता है दांतों की सफेदी और चमक को बरकरार रखना जानिए कैसे-दांतों की सही तरीके से देखभाल करने से न सिर्फ दांत का स्‍वस्‍थ रहना आवश्यक है बल्कि उनकी चमक को भी बरकरार रखना जरुरी है आइये इस बारे में आपको कुछ टिप्‍स बताते है-

आप क्‍या न करें-

  1. बेकिंग सोडा के ज्‍यादा सेवन या इस्‍तेमाल से बचाव करें-पहले तो आपको इसके इस्‍तेमाल से दांत सफेद और चमकदार लग सकते है लेकिन बाद में दांतों में पीलापन आ जाता है-
  2. आप ज्‍यादा गाढ़े रंग वाले फलों या खाद्य सामग्रियों के सेवन से बचें जैसे-सोया सॉस, मरिनारा सॉस आदि दांतों पर दाग छोड़ देते है-नूडल आदि खाने से परहेज करें-
  3. आप बहुत ज्‍यादा मात्रा में एनर्जी ड्रिंक न पिएं-इसमें मिला हुआ एसिड दांतों को नुकसान पहुंचाता है और दातों की सफेदी चली जाती है-

आप क्‍या करें-

  1. आप समय-समय पर अपने ब्रश को बदलते रहें-हर तीन महीने में ब्रश को बदलना सही रहता है-ब्रश अच्‍छी क्‍वालिटी का होना चाहिये ताकि दातों और मसूडों को नुकसान न पहुंचे-
  2. आप अपनी जीभ को भी साफ रखें तथा जब भी ब्रश करें आप अपनी जीभ को साफ करना कतई न भूलें-इससे सांसों में बदबू नहीं आएगी और आपका मुंह फ्रेश रहेगा-
  3. फल को काटकर खाने से बेहतर है कि आप उसे यूं ही खाएं-इससे दांतों में मजबूती आएगी और आपके दांत भी साफ रहेगें तथा स्‍ट्रांग बनेगें-
  4. READ MORE- पायरिया से परेशान है तो करे ये उपाय Pyorrhea Upset So to these Treatments

Upcharऔर प्रयोग-
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पायरिया से परेशान है तो करे ये उपाय Pyorrhea Upset So to these Treatments

पायरिया से परेशान है तो करे ये उपाय Pyorrhea Upset So to these Treatments-


पायरिया(Pyorrhea)दाँतों की एक गंभीर बीमारी होती है जो दाँतों के आसपास की मांसपेशियों को संक्रमित करके उन्हें हानि पहुँचाती है दांतों की साफ सफाई में कमी होने से जो बीमारी सबसे जल्दी होती है वो है पायरिया-सांसों की बदबू, मसूड़ों में खून और दूसरी तरह की कई परेशानियां भी होती है जाड़े के मौसम में पायरिया(Pyorrhea)की वजह से ठंडा पानी पीना भी बहुत मुश्किल हो जाता है और पानी ही क्यों कभी-कभी तो हवा भी आपके दांतों को सिहरा देता है-

Pyorrhea


जो लोग खाना खाने के बाद दांतों की सफाई ठीक ढंग से नहीं करते हैं उनको पायरिया जैसी घातक बीमारी होने की संभावना हो सकती है मुंह से गंदी बदबू आना, दांतों में दर्द और मसूड़ों में सूजन और खून आना पायरिया(Pyorrhea) के लक्षण भी हो सकते हैं अगर पायरिया को रोका ना गया तो इस बीमारी की वजह से आपके पूरे दांत गिर सकते हैं-

कई लोग ब्रश तो अच्‍छी तरह से कर लेते हैं मगर जब बात जीभ को साफ करने की आती है तो वह उसे ऐसे ही छोड़ देते हैं जिससे मुंह में बैक्‍टीरिया पनपने लगते हैं यह भी पायरिया(Pyorrhea) होने का एक बड़ा कारण है-

पायरिया(Pyorrhea)का आयुर्वेदिक उपचार-

  1. नीम की पत्‍तियों को धो कर छाया में सुखा लें और फिर उसे एक बर्तन में रख कर जला लें और जब पत्‍तियां जल जाएं तब बर्तन को ढंक दें और फिर कुछ देर के बाद राख में आप सेंधा नमक मिला लें अब इस मिश्रण को शीशी में भर कर लख लें और चूर्ण बना कर दिन तीन चार बार मंजन करें-
  2. 200 मिलीलीटर अरंडी का तेल,5 ग्राम कपूर और 100 मिलीलीटर शहद को अच्छी तरह मिला दें और इस मिश्रण को एक कटोरी में रखकर उसमे नीम के दातुन को डुबोकर दाँतों पर मलें और ऐसा कई दिनों तक करें-आपके लिए यह पायरिया को दूर करने के लिए एक उत्तम उपचार है-
  3. प्याज के टुकड़ों को तवे पर गर्म कीजिए और दांतों के नीचे दबाकर मुंह बंद कर लीजिए इस प्रकार 10-12 मिनट में लार मुंह में इकट्ठी हो जाएगी फिर आप उसे मुंह में चारों ओर घुमाइए तथा फिर निकाल फेंकिए इस प्रकार आप दिन में चार-पांच बार आठ-दस दिन करें आपका पायरिया जड़ से खत्म हो जाएगा तथा दांत के कीड़े भी मर जाएंगे और मसूड़ों को भी मजबूती प्राप्त होगी-
  4. सूखे मसाले जीरा,सेंधा नमक, हरड़, दालचीनी, दक्षिणी सुपारी को समान मात्रा में लें अब इसे बंद बर्तन में जलाकर पीस लें तथा इस मंजन का नियमित प्रयोग करें-
  5. चुटकी भर सादा नमक चुटकी भर हल्दी में चार पांच बुंद सरसों का तेल मिला कर उंगली से दांतों पर लगाकर 20 मिनट तक रखें और लार आने पर थूकते रहें-
  6. काली मिर्च काली मिर्च के चूरे में थोडा सा नमक मिला कर दाँतों पर मलने से भी पायरिया के रोग से छुटकारा पाने के लिए काफी मदद मिलती है-
  7. कच्‍चा अमरूद कच्चे अमरुद पर थोडा सा नमक लगाकर खाने से भी पायरिया के उपचार में सहायता मिलती है क्योंकि यह विटामिन सी का उम्दा स्रोत होता है जो दाँतों के लिए लाभकारी सिद्ध होता है-
  8. आंवला जलाकर सरसों के तेल में मिलाएं अब आप इसे मसूड़ों पर धीरे-धीरे मलें तथा खस, इलायची और लौंग का तेल मिलाकर मसूड़ों में लगाएं-

पायरिया(Pyorrhea)में तम्बाखू का मंजन का प्रयोग-

सामग्री-

सादी तम्बाकू- 50 ग्राम
सेंधा नमक - 25 ग्राम
फिटकरी - 25 ग्राम

सबसे पहले आप तम्बाखू को लेकर तवे पर काला होने तक भूनें और फिर पीसकर कपडे से छान कर महीन चूर्ण कर लें तथा सेंधा नमक और फिटकरी बराबर मात्रा में लेकर पीस लें और तीनों को मिलाकर तीन बार छान लें ताकि ये सभी पावडर एक साथ मिल जाएँ अब इस मिश्रण को थोड़ी मात्रा में हथेली पर रखकर इस पर नीबू के रस की पांच से छ: बूँदें टपका दें और अब इससे दाँतों व मसूढ़ों पर लगाकर हल्के-हल्के अँगुली से मालिश करें आप यह प्रयोग सुबह और रात को सोने से पहले 10 मिनट तक करके पानी से कुल्ला करके मुँह साफ कर लें-जो लोग तम्बाकू का प्रयोग नहीं करते उन्हें इसके प्रयोग में तकलीफ होगी तथा उन्हें चक्कर आ सकते हैं अत: आप सावधानी के साथ कम मात्रा में मंजन लेकर प्रयोग करें-

पायरिया(Pyorrhea)के लिए एक अन्य प्रयोग-

सामग्री-

गंधक रसायन- 5 ग्राम
आरोग्यवर्धिनी बटी - 5 ग्राम
कसीस भस्म - 5  ग्राम
शुभ्रा(फिटकरी) भस्म- 5 ग्राम
सोना गेरू- 10  ग्राम
त्रिफला चूर्ण-  20 ग्राम (उपरोक्त ये सभी दवाए आप आयुर्वेदिक दवा खाने से ले)

उपरोक्त सभी सामग्री को आप घोंट करके मिला लीजिये तथा इस पूरी दवा की बराबर वजन की कुल आप इक्कीस पुड़िया बना लीजिये फिर सुबह-दोपहर-शाम को एक-एक पुड़िया एक कप पानी में घोल कर मुंह में भर कर जितनी देर रख सकें रखिये फिर उसे निगल लीजिये-

अन्य प्रयोग-

  1. अनार के छिलके पानी मे डाल कर खूब खौला कर ठंडा कर लें -इस पानी से दिन मे तीन चार बार कुल्ले करें-इससे मुंह की बदबू से बहुत जल्द छुटकारा मिल जाएगा -
  2. बादाम के छिलके तथा फिटकरी को भूनकर फिर इनको पीसकर एक साथ मिलाकर एक शीशी में भर दीजिए-इस मंजन को दांतों पर रोजाना मलने से पायरिया रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है-
  3. पायरिया होने पर कपूर का टुकड़ा पान में रखकर खूब चबाने और लार एवं रस को बाहर निकालने से पायरिया रोग खत्म होता है-
  4. एक गिलास गर्म पानी में 5 से 6 बूंद गर्म पानी में लौंग का तेल मिलाकर प्रतिदिन गरारे व कुल्ला करने से पायरिया रोग नष्ट होता है-

पायरिया से बचाव और सावधानियाँ-

  1. दिन में दो बार दाँतों को सही और नियमित रूप से ब्रश करना बहुत ज़रूरी होता है तथा शरीर में मौजूद विषैले तत्वों के निकालने के लिए पानी का सेवन भरपूर मात्रा में करें और आप विटामिन सी युक्त फल, जैसे कि आंवला, अमरुद, अनार, और संतरे का भी सेवन भरपूर मात्रा में करें-
  2. पायरिया के इलाज के दौरान रोगी को मसाले रहित उबली सब्ज़ियों का ही सेवन करें-
  3. मसालेदार खान पान,जंक फ़ूड और डिब्बाबंद आहार का सेवन बिल्कुल भी न करें-
  4. चीज़ और दूध के अन्य उत्पादनों का सेवन बिल्कुल भी न करें क्योंकि इनका दाँतों से चिपकने का खतरा होता है और जीवाणुओं के बढ़ने में सहायता करते हैं-
  5. धूम्रपान और तम्बाकू के सेवन से भी बचें क्योंकि यह पायरिया की बीमारी को बढाते हैं-
  6. पायरिया रोग से पीड़ित रोगी को कभी-भी चीनी,मिठाई या डिब्बा बंद खाद्य पदार्थों का उपयोग नहीं करना चाहिए-
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Upcharऔर प्रयोग-
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कैसे आप तनाव से मुक्त हो सकते है How can You be Free of Stress

कैसे आप तनाव से मुक्त हो सकते है How can You be Free of Stress-



आज की तनाव(Stress)भरी जिन्दगी है जिन्दगी में काम की भागदौड है या फिर पारिवारिक क्लेश है या मानसिक चिंता से पीड़ित है तो इसका आपके मस्तिष्क पे बुरा प्रभाव भी पड़ता है जिससे कारण स्मरण शक्ति(Memory)का हास होना स्वाभाविक है और धीरे-धीरे समयानुसार आपके आत्म-विश्वास में कमी होने लगती है-

How can You be Free of Stress


तो आपको भागमभाग जिन्दगी में इन सभी कमियों को दूर करना भी आवश्यक है वर्ना कुछ समय बाद आपको भूलने जैसी बीमारी से दो-चार होना पड़ता है इस प्रकार का व्यक्ति क्रोध,बैचेनी,सिरदर्द ,आत्म-ग्लानी आदि का भी शिकार हो जाता है तो आप सभी के लिए एक नुस्खा है जिसे प्रयोग करके आप अपने मस्तिष्क को शक्तिशाली बनाए-

आवश्यक सामग्री-

शंखपुष्पी - 100 ग्राम
ब्राह्मी     - 100 ग्राम
गिलोय    - 100 ग्राम
आंवला    - 100 ग्राम (सूखा हुआ )
जटामासी - 100 ग्राम (सभी सामग्री आयुर्वेद जड़ी-बूटी विक्रेता से आसानी से प्राप्त )

प्रयोग विधि-


उपरोक्त सभी सामग्री को महीन कूट-पीस करछान कर एक एयर टाईट कांच के बर्तन में रख ले और प्रतिदिन इसकी एक-एक चम्मच मात्रा शहद या जल या आंवले के शरबत के साथ दिन में तीन बार ले तथा बच्चो को इसकी मात्रा आधा चम्मच दे - गर्भवती महिला यदि गर्भ-काल में नियमित सेवन करती है तो होने वाला बच्चा हर प्रकार से स्वस्थ और मानसिक रोगों मुक्त रहता है-वृद्ध भी इसका सेवन कर सकते है  और ये पूर्ण रूप से सुरक्षित प्रयोग है -

Upcharऔर प्रयोग-
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सोरायसिस का उपचार Psoriasis Treatment

सोरायसिस का उपचार Psoriasis Treatment-


सोरायसिस(Psoriasis)त्वचा की ऊपरी सतह का एक चर्म रोग है ये वंशानुगत है लेकिन ये और भी कई कारणों से भी हो सकता है आनु्‌वंशिकता के अलावा इसके लिए पर्यावरण भी एक बड़ा कारण माना जाता है यह असाध्य बीमारी कभी भी किसी को भी हो सकती है कई बार Psoriasis इलाज के बाद इसे ठीक हुआ समझ लिया जाता है जबकि यह रह-रहकर सिर उठा लेता है शीत ऋतु में यह बीमारी प्रमुखता से प्रकट होती है-

Psoriasis


सोरयासिस(Psoriasis)एक प्रकार का चर्म रोग है जिसम त्वचा में Cells की तादाद बढने लगती है चमडी मोटी होने लगती है और उस पर खुरंड और पपडीयां उत्पन हो जाती हैं ये पपडीया सफेद चमकीली हो सकती है इस रोग के भयानक रूप में पूरा शरीर मोटा लाल रंग का पपडीदार चमडी से ढक जाता है यह रोग अधिकतर के कोहनी,घुटना और खोपडी पर होता है अच्छी बात ये है की यह रोग छूतहा याने संक्रमक नही है रोगी के संपर्क से अन्य लोगो को कोई खतरा नहीं है-

सोरायसिस चमड़ी की एक ऐसी बीमारी है जिसके ऊपर मोटी परत जम जाती है दरअसल चमड़ी की सतही परत का अधिक बनना ही सोरायसिस है त्वचा पर भारी सोरायसिस की बीमारी सामान्यतः हमारी त्वचा पर लाल रंग की सतह के रूप में उभरकर आती है और स्केल्प(सिर के बालों के पीछे)हाथ-पाँव अथवा हाथ की हथेलियों, पाँव के तलवों, कोहनी, घुटनों और पीठ पर अधिक होती है वैसे एक-दो प्रतिशत जनता में यह रोग पाया जाता है-

चिकित्सा में अभी तक ऐसा परिक्षण नहीं है जिससे सोरयासिस(Psoriasis)रोग का पता लगाया जा सके-खून की जांच से भी इस रोग का पता नही चलता है-

सोरायसिस(Psoriasis)लक्षण-

रोग से ग्रसित(आक्रांत)स्थान की त्वचा चमकविहीन, रुखी-सूखी, फटी हुई और मोटी दिखाई देती है तथा वहाँ खुजली भी चलती है सोरायसिस के क्रॉनिक और गंभीर होने पर 5 से 40 प्रतिशत रोगियों में जोड़ों का दर्द और सूजन जैसे लक्षण भी पाए जाते हैं एवं कुछ रोगियों के नाखून भी प्रभावित हो जाते हैं और उन पर रोग के चिह्न दिखाई देते हैं-

क्यों और किसे होता है सोरायसिस(Psoriasis) -

सोरायसिस क्यों होता है इसका सीधे-सीधे उत्तर देना कठिन है क्योंकि इसके मल्टी फ्लेक्टोरियल(एकाधिक) कारण हैं अभी तक हुई खोज(रिसर्च)के अनुसार सोरायसिस की उत्पत्ति के लिए मुख्यतः जेनेटिक प्री-डिस्पोजिशन और एनवायरमेंटल फेक्टर को जवाबदार माना गया है सोरायसिस वंशानुगत रोगों की श्रेणी में आने वाली बीमारी है एवं 10 प्रतिशत रोगियों में परिवार के किसी सदस्य को यह रोग रहता है-

किसी भी उम्र में नवजात शिशुओं से लेकर वृद्धों को भी हो सकती है यह इंफेक्टिव डिसिज(छूत की बीमारी)भी नहीं है सामान्यतः यह बीमारी 20 से 30 वर्ष की आयु में प्रकट होती है लेकिन कभी-कभी इस बीमारी के लक्षण क्रॉनिक बीमारियों की तरह देरी से उभरकर आते हैं सोरायसिस एक बार ठीक हो जाने के बाद कुछ समय पश्चात पुनः उभर कर आ जाता है और कभी-कभी अधिक उग्रता के साथ प्रकट होता है ग्रीष्मऋतु की अपेक्षा शीतऋतु में इसका प्रकोप अधिक होता है-

सोरायसिस(Psoriasis)होने पर क्या करें-

सोरायसिस होने पर विशेषज्ञ चिकित्सक के बताए अनुसार निर्देशों का पालन करते हुए पर्याप्त उपचार कराएँ ताकि रोग नियंत्रण में रहे-थ्रोट इंफेक्शन से बचें और तनाव रहित रहें क्योंकि थ्रोट इंफेक्शन और स्ट्रेस सीधे-सीधे सोरायसिस को प्रभावित कर रोग के लक्षणों में वृद्धि करता है त्वचा को अधिक खुश्क होने से भी बचाएँ ताकि खुजली उत्पन्न न हो-

सोरायसिस(Psoriasis)लिए उपचार-

सोरायसिस के उपचार में बाह्य प्रयोग के लिए एंटिसोरियेटिक क्रीम-लोशन तथा ऑइंटमेंट की महत्वपूर्ण भूमिका होती है-रोग की तीव्रता न होने पर साधारणतः मॉइस्चराइजिंग क्रीम इत्यादि से ही रोग नियंत्रण में रहता है लेकिन जब बाह्योपचार से लाभ न हो तो मुँह से ली जाने वाली एंटीसोरिक और सिमटोमेटिक औषधियों का प्रयोग आवश्यक हो जाता है आजकल अल्ट्रावायलेट लाइट से उपचार की विधि भी अत्यधिक उपयोगी और लाभदायक हो रही है-

कुछ रोगी बताते है की गर्मी के मौसम में और धूप से उनको राहत मिलती है लेकिन एलोपेथिक चिकित्सा मे यह रोग लाईलाज माना गया है उनके मतानुसार यह रोग सारे जीवन भुगतना पडता है लेकिन कुछ कुदरती चीजे है जो इस रोग को काबू में रखती हैं और रोगी को सुकून मिलता है-

आइये जाने सोरायसिस(Psoriasis)उपचार में क्या अपनायें-


  1. दस नग बादाम का पावडर बना ले फिर आप इसे पानी में उबाले और यह दवा सोरयासिस रोग की जगह पर लगाये तथा रात भर इसे लगी रहने के बाद सुबह मे पानी से धो ले कुछ समय लगातार करने से यह उपचार बहुत अच्छे परिणाम दर्शाता है-
  2. एक चम्मच चंदन का पावडर ले फिर इसे आधा लीटर गरम पानी में उबाले जब पकने के बाद तीसरा हिस्सा रह जाए तब इसे उतार ले अब आप इसमें थोडा गुलाब जल और शक्कर मिला दे-यह दवा दिन में तीन बार पिए ये बहुत ही एक कारगर उपचार है-
  3. पत्ता गोभी भी सोरयासिस में एक अच्छा प्रभाव दिखाती है आप उपर का पत्ता ले और इसे पानी से धोले फिर हथेली से दबाकर सपाट कर ले अब इसे थोडा सा गरम करके प्रभावित हिस्से पर रखकर उपर सूती कपडा लपेट दे-यह उपचार लम्बे समय तक दिन में दो बार करने से जबरदस्त फ़ायदा होता है साथ ही पत्तागोभी का सूप सुबह शाम पीने से सोरयासिस में लाभ होते देखा गया है यह प्रयोग भी करने योग्य है-
  4. निम्बू के रस में थोडा पानी मिलाकर रोग स्थान पर लगाने से सुकून मलता है तथा निम्बू का रस तीन घंट के अंतर से दिन में पांच-छ बार पीते रहने से छाल रोग ठीक होने लगता है-
  5. सोरायसिस(Psoriasis)रोग में शिकाकाई को पानी मे उबालकर रोग के धब्बो पर लगाने से ये रोग नियंत्रित होता है-
  6. सोरायसिस(Psoriasis)में केले के पत्तो को आप प्रभावित जगह पर रखे और ऊपर से कपडा लपेटे-इससे भी आपको काफी फ़ायदा होगा-
  7. कुछ चिकित्सक जडी-बूटी की दवाई में Steroids मिलाकर ईलाज करते है जससे रोग शीघ्रता से ठीक होता प्रतीत होता है-लेकिन ईलाज बंद करने पर रोग पुन: भयानक रूप में प्रकट हो जाता है-
  8. इस रोग को ठीक करने के लिए जीवन शैली में भी बदलाव करना जरूरी है सर्दियों में 3 लीटर और गर्मियों में 5 से 6 लीटर पानी पीने की आदत बना ले-इससे वर्जतीय पदार्थ शरीर से बाहर निकलेगे-
  9. सोरयासिस चिकित्सा का एक नियम यह है कि रोगी को दस से पंद्रह दिन तक सिर्फ फ़लाहार पर रखना चाहिये तथा उसके बाद दूध और फ़ल का रस चालू करना चाहये-
  10. रोगी के कब्ज़ निवारण के लिये गुन गुने पानी का एनीमा देना चाहिये-इससे रोग की तीव्रता घट जाती है तथा अपरस वाले भाग को नमक मले पानी से धोना चाहये फिर उस भाग पर जेतुन का तेल लगाना चाहिए और खाने में नमक बिलकुल ही वर्जित है और पीडित भाग को नमक मिले पानी से धोना चाहये-
  11. धुम्रपान करना और अधिक शराब पीना तो विशेष रूप से हानिकारक है ज्यादा मिर्च मसालेदार चीज़े भी न खाएं-

सोरायसिस(Psoriasis)का यूनानी प्रयोग-

सोरायसिस के इलाज के लिए शरबत मुरक्कब मुसफ्फी खून शरबत उन्नाब, इत्रिफल शाहतरा, रोगन नीम, माजून फलासफा जैसी दवाएं पाउडर, चटनी, तेल व काढ़े के रूप मेे देते हैं यह इलाज रोग के आधार पर 4-6 माह तक चलता है-

सोरायसिस(Psoriasis)के लिए परहेज भी जरूरी-

इस पद्धति से इलाज के दौरान मरीज को अचार, बैंगन, आलू और बादी करने वाली चीजों से परहेज करना होता है तथा साथ ही बैलेंस डाइट के साथ ओमेगा थ्री फैटी एसिड युक्तखाद्य पदार्थ जैसे बादाम,अखरोट,अलसी के बीज,राजमा और जैतून का तेल प्रयोग करें-

आजकल कुछ चिकित्सक इस रोग क उपचार मरहम/आयन्टमेन्ट आदि लगा-लगा कर रहे है जबकि यह बीमारी केवल खाने-पीने की दवाओं द्वारा ही जड़ से समूल नष्ट की जा सकती है-चर्म रोग होने पर उसे ऊपरी उपचार द्वारा दबाना अन्य कई प्रकार की बीमारियों को नियंत्रण देना है-इससे रक्तचाप व मानसिक बीमारियां व अन्य घातक बीमारियां स्वत: ही पैदा होने लगती हैं-प्रभावित चर्म स्थान पर मरह्म व अन्य दवाओं के उपयोग से बीमारी समाप्त न होकर शरीर के अन्दरूनी अंगों को हानि पहुंचाती है-

इस बीमारी का सही प्रकार से उपचार करने से पूर्व रोग की जड़ को दूर करना आवश्यक होता है पहले ह रोगी की शारीरिक मानसिक प्रकृति को जानकार खाने व पीने की औषधियां देते हैं-अनन्तः रोगी की प्रतिरोधक शक्ति को बढ़ाकर बीमारी को जड़ से दूर किया जाता है-उपचार से पहले या उपचार के दौरान यदि रोगों को ज्यादा परेशानी होती है तो तात्कालिक उपचार के लिए अन्य प्रकार की औषधियां दी जाती हैं-

इस बीमारी में दवाओं का सेवन लम्बे समय तक करना आवश्यक होता है-दवाओं का सेवन नियमपूर्वक न करना भी बीमारी को आगे बढ़ाने में पूर्ण सहायक होता है इस बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को खाने-पीने में शुध्द शाकाहारी भोजन, हरी सब्जियां, फल आदि का प्रयोग करना अति आवश्यक है-

नियमित रूप से ताजा पानी अधिकाधिक पीते रहना चाहिये जिससे कि पाचन क्रिया सुलभ बनी रहे तथा नहाने-धोने के लिए बाजार साबुनों का प्रयोग पूर्णतः बन्द करके चिकित्सा प्रणाली में कार्य करने वाले साबुनों का उपयोग हितकर होता है-

वर्तमान में सोरायसिस नामक यह रोग-धीरे-धीरे संक्रमण की तरह देश में फैल रहा है-इसके लिए रहन-सहन शुध्द वातावरण होना अति आवश्यक है-

इसके अलावा इसके अन्य कई प्रकार हैं जो कि कम ही मरीजों मैं पाये जाते हैं जैसे-

Guttate Psoriasis- इसमें 4-5 मिलिमिटर के गोल निशान बनते है ये अक्सर बच्चों मैं गले के संक्रमण के बाद होते हैं और पूरे शरीर पर गोल गोल निशान बनते है जो कि अधिकतर ठीक हो जाते हैं पर कई बार ये क्रोनिक प्लाक सोरायसिस मैं परिवर्तित हो सकते हैं-

Erythrodermic Psorisis- जब सोरायसिस शरीर के 80 प्रतिशत हिस्से तक फैल जाता है तो इसे Erythrodermic Psorisis कहते हैं,यह एक प्रकार का गंभीरतम प्रकार है जिसका तुरंत किसी विशेषज्ञ से उपचार की आवश्यता होती है अन्यथा जीवन के लिए खतरा हो सकता है-

Pustular Psoriasis- यह भी गंभीर प्रकार का सोरायसिस है जिसमें पूरे शरीर पर छाले बन जाते हैं जिनमें Pus भरा होता है-

हमारी त्वचा पर जिस प्रकार से हमारे बाल बढते है तथा जिस तरह नाखून बढते हैं वैसे ही यह निरंतर बनती रहती है और उतरती रहती है और हमारे शरीर की संपूर्ण त्वचा एक महिने में पूरी बदल जाती है पर जहां सोरायसिस होता है वहां यह त्वचा केवल चार दिन में बदल जाती है-

साधारणतया सोरायसिस सामान्य मॉश्चराइजर्स या इमॉलिएंट्स जैसे वैसलीन ,ग्लिसरीन.या अन्य क्रीम्स से भी नियंत्रत हो सकता है सिर पर जब ये होता है तो विशेष प्रकार के टार शैंपू को काम में लिया जाता हैं सिर के लिए सैलिसाइलिक एसिड लोशन और शरीर पर हो तो सैलिसाइलिक एसिड क्रीम विशेष उपयोगी होती है इसके अलावा कोलटार(क्रीम,लोशन,शैम्पू)आदि दवाइयां विशेष उपयोगी होती हैं-

फोटोथैरेपी(Photo-therapy)-


  1. जिसमें सूर्य की किरणों मैं पायी जाने वाली अल्ट्रा वायलेट-A और अल्ट्रा वायलेट-B किरणों से से उपचार किया जाता है.PUVA थैरेपी जिसमें Psoralenes +अल्ट्रा वायलेट A थैरेपी सामान्य रूप से काम लिया जाने वाला उपचार है-
  2. इसके अलावा कैल्सिट्रायोल और कैल्सिपौट्रियोल नामक औषधियों का भी बहुत अच्छा प्रभाव होता है पर ये इतनी महंगी हैं कि सामान्य आदमी की पहुंच से बाहर होती हैं-
  3. इसके अलावा जब बीमारी ज्यादा गंभीर हो तब मीथोट्रीक्सैट और साईक्लोस्पोरिन नामक दवाईयां भी काम ली जाती हैं पर ये सब किसी विशेषज्ञ चिकित्सक की देखरेख मैं ही लेनी चाहिये-
  4. इस रोग का रोगी यदि विशेषज्ञ से मिलता रहे तो ज्यादा परेशान नहीं होता है विशेषज्ञ के बगैर उपचार लेना भारी पङ सकता है क्यों कि अक्सर लोग लंबी बीमारी होने की वजह से नीम हकीमों के और गारंटी से ठीक कर देने वालों के चक्कर मैं पङ जाते हैं और सामान्य रूप से ये भी देखा गया है कि Erythrodermic psorisis या Pustular psoriasis गंभीरतम प्रकार है सोरायसिस के वे इस देशी या गारंटी वाले इलाज की वजह से ही होते है क्यों कि इस प्रकार के उपचार मैं ज्यादा तर स्टीरॉइड्स का उपयोग किया जा सकता है जिनसे अधिकतर चमङी की बीमारियों मैं थोङा बहुत फायदा जरूर होता है पर सोरायसिस मैं ये विष का काम करती है और थोङी सी बीमारी भी पूरे शरीर मैं फैल जाती है-
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Upcharऔर प्रयोग-
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वेरीकोज वेन्स(Varicose Veins)क्या है

वेरीकोज  वेन्स(Varicose Veins)क्या है-


रक्त में हिमोग्लोबिन(Hemoglobin)नामक लाल पदार्थ होता है इसकी विशेषता यह है कि कार्बन डाइऑक्साइड एवं ऑक्सीजन दोनों के साथ प्रति वतर्यता (Reversibly)से जुड़ सकता है-हिमोग्लोबिन जब शरीर के ऊतकों से कार्बन डाइऑक्साइड को ग्रहण करता है वह कार्बोक्सी हिमोग्लोबिन कहलाता है कार्बोक्सी हिमोग्लोबिन वाला रक्त अशुद्ध होता है जो शिराओं से होकर फेफड़ों में श्वांस लेने की प्रक्रिया में हीमोग्लोबिन कार्बन डाइऑक्साइड को छोड़कर शुद्ध ऑक्सीजन ग्रहण करता है-

Varicose Veins

क्या होता है वेरीकोज  वेन्स(Varicose Veins)-

  1. यह शुद्ध रक्त धमनियों द्वारा कोशिकाओं तक पहुंचता है तथा अशुद्ध रक्त का रंग नील लोहित या बैंगनी होता है-शिराओं की भित्तियां पतली होती हैं और ये त्वचा के ठीक नीचे होती हैं-इसीलिए ऊपर से शिराओं को देखना आसान होता है अशुद्ध नील लोहित रंग के रक्त के कारण शिराएं(Veins)हमें नीले रंग की दिखाई देती हैं-शिराओं की तुलना में धमनियों की भित्ति अधिक मोटी होती है और काफी गहराई में स्थित होती है-इस कारण लाल रक्त प्रवाहित होने वाली धमनी हमें दिखाई नहीं देती है-
  2. हमारे शरीर में रक्त को वापस ह्रदय तक ले जाने वाली शिराए जब मोटी होकर उभर कर दिखाई देने लगती है तथा सुजन आ जाती है तब व्यक्ति को टांगो में थकान और दर्द महसूस होता है अधिक उभरी शिराओ के होने का मुख्य कारण  हृदय की तरफ रक्त ले जाने वाली शिराओं में वाल्व लगे होते हैं जिसके कारण ही रक्त का प्रवाह एक दिशा की ओर होता है-
  3. कई प्रकार की बीमरियों(कब्ज, खानपान सम्बन्धी विकृतियां, गर्भावस्था से सम्बन्धित रोग) के कारण शिराओं के रक्त संचार में बाधा उत्पन्न हो जाती है जिसकी वजह से ये शिरायें फैल जाती हैं और रक्त शिराओं में रुककर जमा होने लगता है और सूजन हो जाती हैं और अन्य प्रकार की परेशानियां उत्पन्न हो जाती हैं जैसे-व्यायाम की कमी, बहुत समय तक खड़ा रहना, अधिक तंग वस्त्र, अधिक मोटापा के कारण भी यह रोग हो जाता है यह रोग पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं को अधिक होता है क्योंकि आजकल रसोईघर में खड़े होकर ही भोजन बनाया जाता है-
  4. इस रोग के कारण रोगी व्यक्ति के टांगों में दर्द होता है तथा रोगी व्यक्ति को थकान और भारीपन महसूस होता है इसमें रोगी के टखने सूज जाते हैं और रात के समय टांगों  में ऐंठन होने लगती है तथा त्वचा का रंग बदल जाता है और उसके निचले अंगों में त्वचा के रोग भी हो जाते हैं-

प्राकतिक उपचार(Natural Treatments)करे-

  1. रोगी व्यक्ति को नारियल  का पानी, जौ का पानी, हरे धनिये का पानी, खीरे का पानी, गाजर का रस, पत्तागोभी, पालक का रस आदि के रस को पी कर उपवास रखना चाहिए तथा हरी सब्जियों का सूप भी पीना चाहिए-
  2. कुछ दिनों तक रोगी व्यक्ति को फल, सलाद तथा अंकुरित दालों को भोजन के रूप में सेवन करना चाहिए तथा रोगी व्यक्ति को वे चीजें अधिक खानी चाहिए जिनमें विटामिन सी तथा ई की मात्रा अधिक हो और उसे नमक, मिर्च मसाला, तली-भुनी मिठाइयां तथा मैदा नहीं खाना चाहिए-
  3. पीड़ित रोगी को गरम पानी का एनिमा भी लेना चाहिए तथा इसके बाद रोगी व्यक्ति को कटिस्नान करना चाहिए और फिर पैरों पर मिट्टी का लेप करना चाहिए तथा यदि रोगी व्यक्ति का वजन कम हो जाता है तो मिट्टी का लेप कम ही करें- 
  4. जब रोगी व्यक्ति को ऐंठन तथा दर्द अधिक तेज हो रहो हो तो गर्म तथा इसके बाद ठण्डे पानी से स्नान करना चाहिए-रोगी व्यक्ति को गहरे पानी में खड़ा करने से उसे बहुत लाभ मिलता है-
  5. इस रोग से पीड़ित रोगी को सोते समय पैरों को ऊपर उठाकर सोना चाहिए-इससे रोगी व्यक्ति को बहुत अधिक लाभ मिलता है-

  6. कुछ ये आसन का उपयोग करे तो इसमें निश्चित ही लाभ  होता है जैसे-
  7. सूर्यनमस्कार,शीर्षासन,सर्वागासन,विपरीतकरणी,पवनमुक्तासन,उत्तानपादासन,योगमुद्रासन आदि ये किसी अच्छे योगाचार्य से सीख सकते है .
  8. इसमें समय अवश्य लग सकता है मगर धीरे-धीरे ये रोग चला जाता है-
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