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23 मार्च 2017

क्या आप जानते है कि अन्नप्राशन क्या है

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हिन्दू धर्म संस्कारों में अन्नप्राशन(Annprasan)संस्कार सप्तम संस्कार है इस संस्कार में बालक को अन्न ग्रहण कराया जाता है अभी तक तो आपका शिशु माता का दुग्धपान करके ही वृद्धि को प्राप्त हो रहा था लेकिन अब आगे से स्वयं शिशु को अन्न ग्रहण करके ही शरीर को पुष्ट करना होता है यही प्रकृति का नियम है इसलिए अन्नप्रासन(Annprasan)संस्कार का विधान बनाया गया है-

क्या आप जानते है कि अन्नप्राशन क्या है


क्या है अन्नप्राशन-



1- अन्नप्रासन(Annprasan)संस्कार लगभग पांच माह की आयु होने पर शिशु को अन्न ग्रहण कराकर उसके शारीरिक विकास को प्रशस्त करना ही एक मात्र उद्देश्य होता है इस कार्य को शुभ दिन तथा नक्षत्र चौघडि़यां आदि देखकर मुहुर्त के अनुसार किया जाता है-

2- माता के गर्भ में मलिन भोजन के जो दोष शिशु में आ जाते हैं उनके निवारण और शिशु को शुद्ध भोजन कराने की प्रक्रिया को अन्नप्राशन-संस्कार कहा जाता है-

3- अन्न का शरीर से गहरा सम्बन्ध है जब शिशु के दाँत उगने लगे तब हमें जानना चाहिए कि प्रकृति ने उसे ठोस आहार, अन्नाहार करने की स्वीकृति प्रदान कर दी है तब बालक को जब पेय पदार्थ, दूध आदि के अतिरिक्त अन्न देना प्रारम्भ किया जाता है तब इसी प्रक्रिया को अन्नप्राशन संस्कार कहा जाता है-

4- बालक को उबटन स्नान के बाद नए-नए वस्त्र पहनाकर शुद्ध साफ बर्तन में खीर बनाकर चांदी की चम्मच कटोरी में रखकर सर्वप्रथम घर के सबसे बुजुर्ग सदस्य के द्वारा बालक को खीर खिलानी चाहिये इसके पश्चात सभी सदस्य शिशु को खीर चटाते है-

5- सूक्ष्म विज्ञान के अनुसार अन्न के संस्कार का प्रभाव व्यक्ति के मानस पर स्वभाव पर भी पड़ता है आहार स्वास्थ्यप्रद होने के साथ पवित्र, संस्कार युक्त हो इसके लिए भी अभिभावकों, परिजनों को जागरूक करना जरूरी होता है अन्न को व्यसन के रूप में नहीं औषधि और प्रसाद के रूप में लिया जाय-इस संकल्प के साथ अन्नप्राशन संस्कार सम्पन्न कराया जाता है-

6- अन्नप्राशन के लिए प्रयुक्त होने वाली कटोरी तथा चम्मच और चाटने के लिए चाँदी का उपकरण हो सके तो अति उत्तम है-तथा अलग पात्र में बनी हुई चावल या सूजी (रवा) की खीर, शहद, घी, तुलसीदल तथा गंगाजल-  ये पाँच वस्तुएँ अन्नप्राशन तैयार रखनी चाहिए-शुद्ध आहार से शरीर में सत्व गुण बढाता है-

7- अन्न से केवल शरीर का पोषण ही नहीं होता है बल्कि मन, बुद्धि, तेज़ व आत्मा का भी पोषण होता है इसी कारण अन्नप्राशन को संस्कार रुप में स्वीकार करके शुद्ध, सात्त्विक व पौष्टिक अन्न को ही जीवन में लेने का व्रत करने हेतु अन्नप्राशन-संस्कार संपन्न किया जाता है-

8- अन्नप्राशन का उद्देश्य बालक को तेजस्वी, बलशाली एवं मेधावी बनाना है इसलिए बालक को धृतयुक्त भात या दही, शहद और धृत तीनों को मिलाकर अन्नप्राशन करने का का विधान है-

9- बालक को ऐसा अन्न दिया जाना चाहिए जो पचाने में आसान व बल प्रदान करने वाला हो-

10- छ से सात माह के शिशु के दांत निकलने लगते हैं और शिशु की पाचन क्रिया प्रबल होने लगती है ऐसे में जैसा शिशु अन्न खाना वह प्रारंभ करता है उसी के अनुरुप उसका तन-मन बनता है-

11- मनुष्य के विचार, भावना, आकांक्षा एवं अंतरात्मा बहुत कुछ अन्न पर ही निर्भर रहती है और अन्न से ही जीवन तत्व प्राप्त होते हैं जिससे रक्त, मांस आदि बनकर जीवन धारण किए रहने की क्षमता उत्पन्न होती है अन्न ही मनुष्य का स्वाभाविक भोजन है उसे भगवान् का कृपा-प्रसाद समझकर ग्रहण करना चाहिए-

अन्न के प्रभाव की रोचक एक कथा-


महाभारत में एक रोचक कथा आती है जब शरशय्या पर पडे भीष्म पितामह पांडवों को कोई उपदेश दे रहे थे कि अचानक द्रौपदी को हंसी आ गई-द्रौपदी के इस व्यवहार से पितामह को बड़ा‌ आश्चर्य हुआ तब उन्होंने द्रौपदी से हंसने का कारण पूछा ?

द्रौपदी ने विनम्रता से कहा-आपके उपदेशों में धर्म का मर्म छिपा है पितामह! आप हमें कितनी अच्छी-अच्छी ज्ञान की बातें बता रहे हैं लेकिन यह सब सुनकर मुझे कौरवों की उस सभा की याद हो आई है जिसमें वे मेरे वस्त्र उतारने का प्रयास कर रहे थे और तब मैं चीख-चीखकर न्याय की भीख मांग रही थी लेकिन आप वहां पर होने के बाद भी मौन रहकर उन अधर्मियों का प्रतिवाद नहीं कर रहे थे-आप जैसे धर्मात्मा उस समय क्यों चुप रहें? आपने दुर्योधन को क्यों नहीं समझाया था यहीं सोचकर मुझे हंसी आ गई-

इस पर भीष्म पितामह गंभीर होकर बोले-बेटी ! उस समय मैं दुर्योधन का अन्न खाता था उसी से मेरा रक्त बनता था और जैसा कुत्सित स्वभाव दुर्योधन का है वही असर उसका दिया अन्न खाने से मेरे मन और बुद्धि पर पडा-किंतु अब अर्जुन के बाणों ने पाप के अन्न से बने रक्त को मेरे तन से बाहर निकाल दिया है और मेरी भावनाएं शुद्ध हो गई हैं इसलिए अब मैं वहीं कह रहा हूं जो धर्म के अनुकूल और न्यायोचित है-

Upcharऔर प्रयोग-

मनुष्य जीवन के होने वाले संस्कार क्या हैं

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संस्कार(Sanskar)का वास्तविक अर्थ होता है शुद्धिकरण और हिन्दूओं संस्कारों का विशेष महत्व है ये संस्कार आदि काल से चला आ रहा है सभी संस्कार हमारे मन-कर्म-वाणी-और शरीर के उत्थान के लिए हमारे ऋषियों ने इसका प्रवधान किया है हमारे सनातन धर्म में सोलह संस्कार(Sanskar) बताये गए है आइये जाने अब तक आपने अपने जीवन काल में कितने अपनाए है और आगे कितने संस्कार होना बाकी है-

मनुष्य जीवन के होने वाले संस्कार क्या हैं

सभी सोलह संस्कारों के लिए सनातन धर्म(Sanatan Religion) में इसकी व्याख्या की गई है इसका मूल अर्थ है जीवन में पिछले किये गए पाप कर्मो का जो प्रभाव आज हमारे जीवन में है उसको मिटा कर अच्छा प्रभावशाली बनाना-भगवान् को भी इस मृत्यु लोक में आकर उन सभी संस्कारों को करना पडा था-सभ्य समाज के लिए जो संस्कार आवश्यक है उनके न करने से समाज भी हमें हेय द्रष्टि से देखता है-

भगवान् राम के संस्कार ऋषि वशिष्ठ और कृष्ण के सभी संस्कार(sanskar) ऋषि संदीपनी द्वारा सम्पूर्ण कराये गए थे-ये संस्कार हमें समाज के अनुरूप चलना सिखाते है और हमारी दिशा बोध भी कराते है -क्युकि हमारी खुद की पहचान समाज ही निर्धारित करता है आप खुद कुछ भी नहीं है अगर ये समाज न हो ?

संस्कार(sanskar) हमारे धार्मिक और सामाजिक जीवन की पहचान होते हैं भारतीय संस्कृति में मनुष्य को राष्ट्र, समाज और जनजीवन के प्रति जिम्मेदार और कार्यकुशल बनाने के लिए जो नियम तय किए गए हैं उन्हें संस्कार कहा गया है-प्रमुख रूप से सोलह संस्कार माने गए हैं जो गर्भाधान से शुरू होकर अंत्येष्टी पर खत्म होते हैं-संस्कारों से गुणों में वृद्धि होती है जिससे हमारा जीवन बहुत प्रभावित होता है-

कुछ जगह 48 संस्कार भी बताया गया है महर्षि अंगिरा ने 25 संस्कारों का उल्लेख किया है लेकिन महर्षि वेद व्यास स्मृति शास्त्र के अनुसार 16 संस्कार ही आज प्रचलित हैं-

कितने भारतीय संस्कार(Sanskar) है-


1- गर्भाधान संस्कार
2- पुंसवन संस्कार
3- सीमन्तोन्नयन संस्कार
4-जातकर्म संस्कार
5- नामकरण संस्कार
6- निष्क्रमण संस्कार
7- अन्नप्राशन संस्कार
8- मुंडन संस्कार
9- कर्णवेध संस्कार
10-उपनयन संस्कार
11-विद्यारंभ संस्कार
12-केशांत संस्कार
13- समावर्तन संस्कार
14-विवाह संस्कार
15-विवाहाग्नि संस्कार
16-अंत्येष्टि संस्कार

आइये अब आप इन संस्कारों के बारे में भी समझ ले पहले लोग इन संस्कारों को कैसे किया करते थे आज पच्छिमी सभ्यता(West civilization) में बहुत कुछ लोप होता जा रहा है जिसके परिणाम ये कह सकते है हम संस्कार विहीन होते जा रहे है-

गर्भाधान संस्कार क्या है-


पुरातन काल में दाम्पत्य बंधन में बंधे हुए माता-पिता(पति-पत्नी)अपने गुरु के साथ हवन-यज्ञ करते हुए ईश्वर से कर बद्ध प्रार्थना करते थे कि हमारे घर में पवित्र और पुण्यात्मा जैसे बच्चे का आगमन हो हर माँ-बाप की एक इक्षा होती है उत्पन्न होने वाला बालक संस्कारी हो तथा उसका खुशहाल जीवन हो-गर्भ-धारण के भी दिन और नियम बनाए गए है उन सभी रात्रियों में सम्भोग करने से बालक तेजस्वी और प्रतापी तथा आयुष्मान(Aayushmaan) होता था -आप निम्न पोस्ट से जानकारी  ले  सकते है-

संतान प्राप्ति के नियम और उपाय-

पुंसवन  संस्कार क्या है-


पुंसवन संस्कार गर्भधारण के पश्चात किया जाने वाला विधान है बालक स्थिर हो सुंदर हो गुणवान हो इसके लिए भी यज्ञ का अनुष्ठान किया जाता है-

सीमन्तोन्नयन संस्कार क्या है-


ये संस्कार गर्भधारण के चौथे-छठवें-और आठवें माह में सम्पन्न कराया जाता है गर्भवती माता इसी समय से सभी आचार-विचार का पूर्ण रूप से पालन करती है उसका खान-पान-रहन-सहन व्यवहार सभी कुछ होने वाले बच्चे के अनुकूल हो क्युकि गर्भस्थ शिशु इस समय सीखने के काबिल हो जाता है-अभिमन्यु और भक्त प्रहलाद ने गर्भ में ही रहते हुए अपनी माँ से सीखा था-

जातकर्म संस्कार क्या है-


जन्म के पश्चात गर्भस्त्रावजन्य दोष दूर करने के लिए नालछेदन के पूर्व ही अनामिका अंगुली से शहद+घी+स्वर्ण चटाया जाता है एक भाग घी और चार भाग शहद से बालक की जीभ पर ॐ लिखा जाता है -

नामकरण संस्कार क्या है-


बालक के जन्म के बाद ग्यारहवे या सौ या फिर एक सौ एक दिन पर नामकरण संस्कार का विधान है ज्योतिष या विद्वान् के द्वारा बालक का नामकरण किया जाता है उसी समय नामकरण के पश्चात सूर्य दर्शन का भी विधान है बालक के नए नामकरण के बाद सभी लोग उसे अपना आशीर्वाद देते है और उसके स्वास्थ एवं सुख की मंगल-कामना की जाती है -नाम पवित्र रखने का विधान है जो देवताओं से सम्बंधित हो और बालक का नाम लेते समय ईश्वर का नाम आये -लेकिन बदलते वक्त पर सभी लोग अभिनेताओं से सम्बंधित उल्टे-सीधे नाम रखने लगे है -

निष्क्रमण संस्कार क्या है-


ये संस्कार बालक के जन्म के चौथे माह किया जाता है चूँकि हमारा शरीर पंचमहाभूत से बना है ये पंचमहाभूत -पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश है और निष्क्रमण का अर्थ है बाहर निकालना-अत: बच्चे को पहली बार शुद्ध खुली हवा में लाया जाता है तथा देवताओं से प्रार्थना की जाती है कि सभी देवता उसकी रक्षा करे-

अन्नप्राशन संस्कार क्या है-


इस संस्कार में नियम ये है कि बालक को सोने-चांदी के चम्मच से खीर चटाई जाती है चूँकि गर्भ में रहते हुए बालक के पेट में गंदगी चली जाती है अन्नप्राशन संस्कार बच्चे को शुद्ध भोजन कराने से होता है ये संस्कार छ: या सात माह की अवस्था में किया जाता है इसके बाद बालक अन्न ले सकता है उसी समय बच्चे के नए दांत का भी उदभव होता है-

देखें-  क्या आप जानते है कि अन्नप्राशन क्या है

मुंडन संस्कार क्या है-


वपन क्रिया संस्कार, मुंडन संस्कार या चूड़ाकर्म संस्कार आदि नामों से इसे संबोधित किया जाता है-ये संस्कार बच्चे की उम्र के पहले वर्ष के अंत में या तीसरे, पांचवें या सातवें वर्ष के पूर्ण होने पर बच्चे के बाल उतारने को कहते हैं-इस संस्कार से सिर पे घने व नए बाल का आगमन तथा सिर का मजबूत होना और बुधि प्रखर होना आदि है -

कर्णवेध संस्कार क्या है-


कर्णवेध संस्कार का मतलब कान और नाक का छेदना है ये छ:माह के बाद से पांच वर्ष का बालक होने के बीच किया जाता है काफी जगह आज भी ये परम्परा प्रचलित है कान छेदने से एक्यूपंक्चर होता है और मस्तिष्क में जाने वाली रक्त का प्रवाह ठीक होता है अब तो वैज्ञानिकों ने भी कर्णभेद संस्कार का पूर्णतया समर्थन किया है और यह प्रमाणित भी किया है की इस संस्कार से कान की बिमारियों से भी बचाव होता है-

पूरी पोस्ट देखें-  कर्ण छेदन संस्कार क्यों होता है

उपनयन संस्कार क्या है-


उप यानी पास और नयन यानी ले जाना-गुरु के पास ले जाने का अर्थ है उपनयन संस्कार- ये बालक के पांच वर्ष पूर्ण होने के बाद का विधान है इसमें यज्ञ करके बालक को एक पवित्र धागा पहनाया जाता है इसे यज्ञोपवीत या जनेऊ भी कहते हैं ये जनेऊ पहना कर ही गुरु आश्रम जाने की प्रथा थी आज भी गुरुकुल में ये प्रथा जारी है जनेऊ में तीन सूत्र होते हैं- ये तीन देवता- ब्रह्मा, विष्णु, महेश के प्रतीक हैं-पहला जन्म तो हमारे माता पिता ने दिया है लेकिन दूसरा जन्म हमारे आचार्य, ऋषि, गुरुजन देते हैं-उनके ज्ञान को पाकर हम एक नए मनुष्य बनते हैं इसलिए इसे द्विज या दूसरा जन्म लेना कहते हैं-

विद्यारंभ संस्कार क्या है-


शिक्षा का प्रारंभ होना ही विद्यारंभ संस्कार है जीवन को सकारात्मक बनाने के लिए शिक्षा जरूरी है-गुरु के आश्रम में भेजने के पहले अभिभावक अपने पुत्र को अनुशासन के साथ आश्रम में रहने की सीख देते हुए भेजते थे-वर्तमान समय में अधिकाँश लोगों ने गुरुकुल में शिक्षा नहीं पायी है इसलिए हमे अपने ही धर्म के बारे में बहुत बड़ी ग़लतफ़हमियाँ हैं और ना ही वर्तमान समय में हमारे माता-पिता को अपनी संस्कृति के बारे में पूर्ण ज्ञान है कि वो हमको हमारे धर्म के बारे में बता सकें-इसलिए बहुत से प्रश्न बालक के मन में ही आंदोलित होते रहते है जादा पूछने पर अभिभावक तो बस कभी- कभी मन्दिर जाने को ही "धर्म" कह देते हैं-ये हमारा दुर्भाग्य ही है आज वेदों के बारे में जानकारी का अभाव हो गया है -

समवर्तन संस्कार क्या है-


शिक्षा ग्रहण अवधि को सम्पूर्ण करने के उपरान्त ब्रम्हचारी बालक को सांसारिक दुनियां में लौटने को ही समवर्तन संस्कार कहते है यानि इसका आशय है ब्रह्मचारी को मनोवैज्ञानिक रूप से जीवन के संघर्षो के लिए तैयार करना है-गुरुकुल में बालक अपनी शिक्षा पूरी कर लेते हैं अर्थात उनको वेदों के अनुसार विज्ञान, संगीत, तकनीक, युद्धशैली, अनुसन्धान, चिकित्सा और औषधी, अस्त्रों शस्त्रों के निर्माण, अध्यात्म, धर्म, राजनीति, समाज आदि की उचित और सर्वोत्तम शिक्षा मिल जाती है उसके बाद यह संस्कार किया जाता है समवर्तन संस्कार में ऋषि, आचार्य, गुरुजन आदि शिक्षा पूर्ण होने के पश्चात अपने शिष्यों से गुरु दक्षिणा भी मांगते हैं-

विवाह संस्कार क्या है-


विवाह को शायद कुछ लोग समझौता समझते होगे लेकिन सनातन धर्म में विवाह को समझौता नहीं संस्कार कहा गया है पति-पत्नी साथ रह कर सृष्टि के विकास में भागीदारी करते है इसी से व्यक्ति पितृऋण से मुक्त होता है ये संस्कार बहुत ही महत्वपूर्ण  संस्कार  है विवाह के समय वेद-मन्त्रों में पति और पत्नी के लिए कर्तव्य दिए गए हैं और इन को ध्यान में रखते हुए अग्नि के सात फेरे लिए जाते हैं जैसे हमारे माता पिता ने हमको जन्म दिया वैसे ही हमारा कर्तव्य है की हम कुल परम्परा को आगे बढायें-हमारे समस्त ऋषियों की पत्नी हुआ करती थीं और ये महान स्त्रियाँ आध्यात्मिकता में ऋषियों के बराबर भी हुआ करती थीं-

वानप्रस्थ संस्कार क्या है-


ग्रहस्थ आश्रम की सभी जिम्मेदारियों का निर्वाह पूर्ण होने के बाद व्यक्ति को वानप्रस्थ आश्रम में जाने का विधान है यानी जंगल में माया मोह से मुक्त होकर अपनी मुक्ति का मार्ग प्राप्त करना-लेकिन आज परिस्थितियाँ अलग है तो भी व्यक्ति को सभी जिम्मेदारी को परिपूर्ण करने के उपरान्त सत्संग,गुरु की निकटता या घर में रह कर एकांत वासी बनकर-प्रभु साधना में लिप्त होना चाहिए-अब तक आपने दूसरों के लिए किया था अब आपको अपनी मुक्ति के लिए करना चाहिए-बस वही किया गया भक्ति और साधना से आपको ज्ञान द्वारा प्राप्त फल -मोक्ष प्रदान करने में सहायक है-

सन्यास संस्कार क्या है-


वानप्रस्थ संस्कार में जब मनुष्य ज्ञान प्राप्त कर लेता है उसके बाद वो सन्यास लेता है और सन्यासी का धर्म है की वो सारे संसार के लोगों को भगवान् के पुत्र पुत्री समझे और अपना बचा हुआ समय सबके कल्याण के लिए दे दे-ये सन्यास संस्कार 75 की वर्ष की आयु में होता है पर अगर इस संसार से वैराग्य हो जाए तो किसी भी आयु में सन्यास लिया जा सकता है और सन्यासी का धर्म है की वो धर्म के ज्ञान को लोगों में बांटे यही उसकी जान सेवा है आजकल सन्यासी नाममात्र को रह गए है अधिकतर इसकी आड़ में माया से लिप्त हैं और उनका व्यापार भी फल-फूल रहा है -

अंत्येष्टि संस्कार क्या है-


ये मनुष्य जीवन का अंतिम संस्कार है आज भी शवयात्रा के समय अग्नि लेकर जाने की परम्परा है-इसका तात्पर्य है विवाह के बाद व्यक्ति ने जो अग्नि घर में जलाई थी उसी से उसके अंतिम यज्ञ की अग्नि जलाई जाती है ये अग्नि घर से ले जाने का विधान है और मृत्यु के साथ ही व्यक्ति स्वयं इस अंतिम यज्ञ में होम हो जाता है लेकिन इस संस्कार से सिर्फ मृत शरीर नष्ट होता है आत्मा तो अजर-अमर है जो कभी नहीं मरती है अपने किये गए इस लोक के कर्म अनुसार ही दूसरी योनी में जन्म लेती है -

विस्तार पूर्वक समझाने के लिए समय मिला तो हम आपको "मृत्यु संस्कार"का पूरा ज्ञान अगली पोस्ट में अवस्य ही देगे-

विशेष-

मनुष्य जन्म आपको उत्तम कर्म करने के लिए ईश्वर द्वारा प्रदान किया जाता है ताकि आप जन्म-मरण(Birth and death) के आवागमन से मुक्त हो सके-अच्छे कार्य और श्रद्धा-भक्ति से ही आप इससे मुक्त हो सकते है-लेकिन मनुष्य रूपी शरीर पा के भी लोग-माया-मोह -काम-क्रोध-लोभ-मद को नहीं छोड़ते है और जीवन के मूल उद्देश्य(Original objective) से भटक कर फिर योनियों में भ्रमण के लिए बाधित होते रहते है-

हमारा लेख अगर आपको उत्तम लगा है तो आप इसे औरों को भी शेयर कर सकते है वर्ना 'ॐ नम:शिवाय ' तो आप बोल ही सकते है-

देखें-  नवजात शिशु के होने वाले संस्कार क्या हैं

Upcharऔर प्रयोग-

22 मार्च 2017

लहसुन को सेवन-योग्य क्यों नहीं मानते हैं

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आपके घरों या जान-पहचान वालो में कुछ ऐसे लोग भी होंगे जो प्याज या लहसुन(Garlic)नहीं खाते होंगे लेकिन क्या आपने कभी यह जानने की कोशिश की है कि ऐसा क्यों हैं आपने अपने घर में दादी-नानी या किसी अन्य बुज़ुर्ग से जो इन्हें ना खाते हों कभी जानने का प्रयास किया है-
लहसुन को सेवन-योग्य क्यों नहीं मानते हैं

यदि आप उनसे इस बारे में पूछेंगे तो अधिकतर लोगों का शायद यहीं जवाब होगा कि अब हमसे यह मत पूछो कि क्यों नहीं खाते है बस जैसा हमारे बड़ो-बुजुर्गों ने हमें बता दिया वो हम कर रहे हैं क्युकि वो लहसुन(Garlic)प्याज(Onion)नहीं खाते थे इसलिए हम भी नहीं खाते है जी हाँ-ये सच है कि बहुत से धर्मों को मानने वाले लोग प्याज और लहसुन खाना पसंद नहीं करते है लेकिन लहसुन और प्याज नहीं खाने के पीछे असल वजह क्या है यह आपको शायद कम ही लोग बता पाएंगे-

लहसुन न खाने का धार्मिक कारण-


प्याज व लहसुन जैसी सब्ज़िया जिनमें काफी रोग प्रतिरोधक गुण होते हैं लेकिन लोगो द्वारा लहसुन खाने योग्य नहीं माने जाने के पीछे जो कारण निकल कर आए है वो धार्मिक भी हैं और पौराणिक भी और वैज्ञानिक भी हैं-सिर्फ वैष्णव धर्म में ही नहीं बल्कि और भी कई धर्मों में लहसुन(Garlic)प्याज(Onion) को शैतानी गुणों वाली, शैतानी दुर्गंध वाली, गंदी और प्रदूषित सब्ज़िया माना जाता है- 

प्राचीन मिस्त्र के पुरोहित प्याज और लहसुन  को नहीं खाते थे चीन में रहने वाले बौद्ध धर्म के अनुयायी भी इन सब्ज़ियों को खाना पसंद नहीं करते हैं और हमारे वेदों में भी बताया गया है कि प्याज और लहसुन जैसी सब्ज़ियां प्रकृति प्रदत्त भावनाओं में सबसे निचले दर्जे की भावनाओं जैसे जुनून, उत्तजेना और अज्ञानता को बढ़ावा देकर किसी व्यक्ति द्वारा भगवद् या लक्ष्य प्राप्ति के मार्ग में बाधा उत्पन्न करती हैं तथा ये व्यक्ति की चेतना को भी प्रभावित करती हैं इसलिए इन्हें नहीं खाना चाहिेए-

भगवान कृष्ण के उपासक भी लहसुन(Garlic)प्याज(Onion) नहीं खाते हैं क्योंकि यह लोग वहीं सब्ज़िया खाते हैं जो कृष्ण को अर्पित की जा सकती हैं और चूंकि प्याज और लहसुन कभी भी कृष्ण को अर्पण नहीं किए जाते हैं इसलिए कृष्ण भक्त इन्हें बिलकुल भी नहीं खाते हैं-

प्याज और लहसुन ना खाए जाने के पीछे सबसे प्रसिद्ध पौराणिक कथा यह है कि समुद्रमंथन से निकले अमृत को, मोहिनी रूप धरे विष्णु भगवान जब देवताओं में बांट रहे थे तभी दो राक्षस राहू और केतू भी वहीं आकर बैठ गए थे भगवान ने उन्हें भी देवता समझकर अमृत की बूंदे दे दीं लेकिन तभी उन्हें सूर्य व चंद्रमा ने बताया कि यह दोनों राक्षस हैं तब भगवान विष्णु ने तुरंत उन दोनों के सिर धड़ से अलग कर दिए और इस समय तक अमृत उनके गले से नीचे नहीं उतर पाया था और चूंकि उनके शरीरों में अमृत नहीं पहुंचा था वो उसी समय ज़मीन पर गिरकर नष्ट हो गए-लेकिन राहू और केतु के मुख में अमृत पहुंच चुका था इसलिए दोनों राक्षसो के मुख अमर हो गए(यहीं कारण है कि आज भी राहू और केतू के सिर्फ सिरों को ज़िन्दा माना जाता है)पर भगवान विष्णु द्वारा राहू और केतू के सिर काटे जाने पर उनके कटे सिरों से अमृत की कुछ बूंदे ज़मीन पर गिर गईं जिनसे प्याज और लहसुन उपजे ऐसा माना जाता है-

चूंकि लहसुन(Garlic)प्याज(Onion)अमृत की बूंदों से उपजी हैं इसलिए यह रोगों और रोगाणुओं को नष्ट करने में अमृत समान होती हैं पर क्योंकि यह राक्षसों के मुख से होकर गिरी हैं इसलिए इनमें तेज़ गंध है और ये अपवित्र हैं जिन्हें कभी भी भगवान के भोग में इस्तमाल नहीं किया जाता है और कहा जाता है कि जो भी प्याज और लहसुन खाता है उनका शरीर राक्षसों के शरीर की भांति मज़बूत हो जाता है लेकिन साथ ही उनकी बुद्धि और सोच-विचार भी राक्षसों की तरह दूषित भी हो जाते हैं-

एक और मत के अनुसार-


इन दोनों सब्जि़यों को मांस के समान माना जाता है इसके पीछे भी एक और कथा प्रचलित है-प्राचीन समय में ऋषि मुनि पूरे ब्रह्मांड के हित के लिए अश्वमेध और गोमेध यज्ञ करते थे जिनमें घोड़े अथवा गायों को टुकड़ों में काट कर यज्ञ में उनकी आहूति दी जाती थी-

यज्ञ पूर्ण होने के बाद यह पशु हष्ट पुष्ट शरीर के साथ फिर से जीवित हो जाते थे-एक बार जब ऐसे ही यज्ञ की तैयारी हो रही थी तो एक ऋषि पत्नी जो की गर्भवती थी उनको मांस खाने की तीव्र इच्छा हुई और कुछ और उपलब्ध ना होने की स्थिति में ऋषिपत्नी ने यज्ञाहूति के लिए रखे गए गाय के टुकड़ो में से एक टुकड़ा बाद में खाने के लिए कुटिया में छिपा लिया-जब ऋषि ने गाय के टुकड़ो की आहूति देकर यज्ञ पूर्ण कर लिया तो अग्नि में से पुनः गाय प्रकट हो गई-पर ऋषि ने देखा की गाय के शरीर के बाएं भाग से एक छोटा सा हिस्सा गायब था

ऋषि ने तुरंत अपनी दिव्य -शक्ति से जान लिया कि उनकी पत्नी ने वह हिस्सा लिया है अब तक उनकी पत्नी भी सब जान चुकी थी इसलिए ऋषि के क्रोध से बचने के लिए उनकी पत्नी ने वह मांस का हिस्सा उठा कर फेंक दिया-लेकिन यज्ञ और मंत्रो के प्रभाव के कारण टुकड़े में जान आ चुकी थी-इसी मांस के टुकड़े की हड्डियों से लहसुन उपजा और मांस से प्याज की उपज हुई है इसलिए वैष्णव अनुयायी प्याज और लहसुन को सामिष भोजन मानते हैं और ग्रहण नहीं करते हैं-

जैन धर्म के मतानुसार-


जैन धर्म को मानने वाले लोग भी प्याज और लहसुन नहीं खाते लेकिन इसके पीछे वजह यह है कि यह दोनों जड़ें हैं और जैन धर्म में माना जाता है कि अगर आप किसी पौधे के फल, फूल, पत्ती या अन्य भाग को खाओ तो उससे पौधा मरता नहीं है लेकिन चूंकि प्याज और लहसुन जड़े हैं इसलिए इन्हें खाने से पौधे की मृत्यू हो जाती है-

अन्य धर्म के मतानुसार-


तुर्की में भी इन सब्जियों को प्रयोग ना करने के पीछे एक दंतकथा प्रचलित है और कहा जाता है कि जब भगवान ने शैतान को स्वर्ग से बाहर फेंका तो जहां उसका बांया पैर पड़ा वहां से लहसुन और जहां दायां पैर पड़ा वहां से प्याज उगा था-

इसके उत्तेजना और जुनून बढ़ाने वाले गुणों के कारण चीन और जापान में रहने वाले बौद्ध धर्म के लोगों ने कभी इसे अपने धार्मिक रिवाज़ो का हिस्सा नहीं बनाया है जापान के प्राचीन खाने में कभी भी लहसुन का प्रयोग नहीं किया जाता था-

आयुर्वेद में प्याज-लहसुन-


भारत के प्राचीन औषधि विज्ञान आर्युवेद में भोज्य पदार्थो को तीन श्रेणियों में बांटा जाता है-सात्विक, राजसिक और तामसिक-अच्छाई और सादगी को बढ़ावा देने वाले भोज्य पदार्थ सात्विक और जुनून और उत्तेजना बढ़ाने वाले भोज्य पदार्थ राजसिक और तामसिक यानि अज्ञानता या दुर्गुण बढ़ाने वाले भोज्य पदार्थ होते है-

प्याज और लहसुन राजसिक भोजन के भाग हैं जो लक्ष्य सिद्धि, साधना और भगवद् भक्ति में बाधा डालते हैं इसलिए लोग इन्हें खाना पसंद नहीं करते हैं-

ये भी सच है कि वनस्पति विज्ञान के अनुसार एलियम कुल की ये सब्ज़ियां रोग प्रतिरोधक क्षमता भी देती हैं प्याज जहां गर्मी के लिए अच्छा होता है वहीं लहसुन में अत्यधिक एंटीबायोटिक गुण होते हैं-

Upcharऔर प्रयोग-

लहसुन की एक कली का रोज सेवन करे

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लहसुन(Garlic)को वैसे तो तामसिक यानी काम व गुस्से की भावना बढ़ाने वाला माना गया है लेकिन लहसुन के औषीय गुण इन बुराईयों से कही अधिक बढ़कर हैं ये गुण ऐसे हैं जिन्हें बहुत कम लोग जानते हैं हम आपको आज बताने जा रहे हैं लहसुन के ऐसे ही गुणों के बारे में-

लहसुन की एक कली का रोज सेवन करे

लहसुन(Garlic)में पाए जाने वाले तत्व-


लहसुन में प्रोटीन 6.3 प्रतिशत,वसा 0.1 प्रतिशत, कार्बोज 21 प्रतिशत, खनिज पदार्थ- 1 प्रतिशत, चूना 0.3 प्रतिशत तथा लोहा1.3 मिलीग्राम प्रति 100 ग्राम होता है तथा इसके अतिरिक्त वीटामिन ए, बी, सी एवं सल्फ्यूरिक एसिड विशेष मात्रा में पाई जाती है-

लहसुन(Garlic)के फायदे-


1- जिन लोगों के शरीर में रक्त की कमी है उन्हें लहसुन का सेवन अवश्य करना चाहिए चूँकि इसमें पर्याप्त मात्रा में लौह तत्व होता है जो कि रक्त निर्माण में सहायक होता है तथा लहसुन में विटामिन सी होने से यह आपको स्कर्वी रोग से भी बचाता है-

2- लहसुन(Garlic)आपके शरीर के कॉलेस्ट्रोल को कम करता है-कॉलेस्ट्रोल की समस्या से परेशान लोगों के लिए लहसुन का नियमित सेवन अमृत साबित हो सकता है-

3- कैंसर के प्रति शरीर की प्रतिरोधक क्षमता में लहसुन वृद्धि करता है-लहसुन में कैंसर निरोधी तत्व होते हैं यह शरीर में कैंसर बढऩे से रोकता है तथा लहसुन के सेवन से ट्यूमर को 50 से 70 फीसदी तक कम किया जा सकता है-

4- गर्भवती महिलाओं को लहसुन का सेवन नियमित तौर पर करना चाहिए और गर्भवती महिला को अगर उच्च रक्तचाप की शिकायत हो तो उसे पूरी गर्भावस्था के दौरान किसी न किसी रूप में लहसुन का सेवन अवश्य ही करना चाहिए-

5- ठंड या बदलते मौसम में अक्सर किसी भी उम्र के लोगों को कफ और जुकाम जैसी परेशानी हो जाती हैं ऐसे में अगर आप लहसुन का नियमित रूप से सेवन करते हैं तो आप ऐसी छोटी-छोटी समस्याओं से बड़ी ही आसानी से निजात पा सकते हैं-

6- लहसुन में एंटीबायोटिक दवाओं से अधिक गुण हैं जिसकी वजह से वह रोगाणुओं का नाश करती है यही कारण है कि घाव धोने के लिए लहसुन के एक भाग रस में तीन भाग पानी मिलाकर काम में लिया जाता है-

7- लहसुन का इस्तेमाल दांत की हड्डियों के आसपास होने वाले संक्रमण से बचाता है-

8- लहसुन में पाया जाने वाला सल्फाइड हृदय वाहिनी तंत्र को भी ठीक रखता है अब तो शोध में इस बात की पुष्टि भी हुई है कि लहसुन खून में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा को नियंत्रित करता है यदि आप नियमित लहसुन का सेवन करते है तो खून में 7.6 प्रतिशत तक कोलेस्ट्रॉल में गिरावट आ सकती है-

9- हर दिन लहसुन का सेवन किया जाए तो दिल की धमनियों के संकरे होने का खतरा कम हो जाता है और इससे होने वाले हार्टअटैक की संभावना भी काफी हद तक कम हो जाती है-

Upcharऔर प्रयोग-

21 मार्च 2017

यूरिक एसिड बढ़ा हुआ है तो आप क्या लें

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यूरिक एसिड(Uric Acid)बढ़ना आजकल लोगों में एक गंभीर समस्या बन गई है प्रारंभिक अवस्था में शरीर में जकड़न शुरू होती है और कुछ समय उपरान्त फिर छोटे जोड़ों में दर्द शुरू होता है आपको यूरिक एसिड बनने की समस्या को हल्के में बिलकुल भी नहीं लेना चाहिए लापरवाही करने पर फिर इलाज होने में समस्या होती है अगर आप भी इस बीमारी से पीड़ित है तो अभी से ध्यान देना शुरू करें इलाज के साथ-साथ आपको अपने खान-पान का भी विशेष ध्यान देना आवश्यक है-
यूरिक एसिड बढ़ा हुआ है तो आप क्या लें

आपकी कमजोर पाचन प्रणाली के कारण यूरिक एसिड(Uric Acid)बनने की समस्या में प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थों का सेवन करना आपके लिए हानिकारक है अत:इसे बंद करने में ही आपकी भलाई है कुछ वर्ष पहले तक यूरिक एसिड की समस्या कम ही लोगों को हुआ करती थी लोगों को ये समस्या अधिकतर वृद्धावस्था में ही होती थी या फिर अमीर खानदान के लोगों में जादा पाई जाती थी क्युकि बिना शारीरिक परिश्रम किये गरिष्ट भोजन उनका मुख्य कारण था-

ये अलबत्ता आलसी प्रवृति के लोगों में भी अधिक होती थी इसके कुछ कारण अनुवांशिक भी देखने को मिलते थे लेकिन आज ये बीमारी हमारे समाज के हर वर्ग हर आयु के लोगों को होने लगी है और एलोपैथी में इस बीमारी के लिए प्रयोग की जाने वाली औषधियां शरीर में गुर्दो आदि अवयवों के लिए काफी नुकसानदेह होती है-

इस बीमारी का उपचार यदि आरम्भ में ही सही समय पर न किया जाये तो मरीज का न् केवल उठना बैठना और चलना फिरना भी दुश्वार होता ही है बल्कि समय बीत जाने पर यह रोग जड़ जमा कर और भी दुस्साध्य भी हो जाता है पिछली तीन-चार पोस्ट में हमने यूरिक एसिड के बारे में काफी वर्णन कर चुके है आइये जाने कि अगर यूरिक एसिड बढ़ा है तो कम करने के लिए क्या लें-

यूरिक एसिड(Uric Acid)बढ़ने पर क्या खायें-


1- आप बाजार से एक कच्चा हरा पपीता लगभग एक किलो तक के वजन का ले कर अच्छी तरह धो लें और फिर उसे बिना छीले ही उसके छोटे-छोटे पीस काट लें-फिर किसी पतीले में डाल कर इस में तीन किलो पानी मिला दें और इस में पांच पैकेट ग्रीन टी(या किसी कपड़े में बांधकर दो बड़े चम्मच)के डाल कर 15 मिनट तक चाय की तरह उबालकर इसे छान लें और पूरा दिन आपको यही पानी पीना है ये लगभग छ या सात गिलास बन जाएगा आपको इसे पंद्रह दिन लगातार उपयोग करना है इसके बाद टेस्ट करवा लें यदि थोडा बहुत बाकी है तो इसे पन्द्रह दिन और ले लें आपकी यूरिक एसिड(Uric Acid)की समस्या खत्म हो जायेगी और दुबारा नहीं होगी-

2- अजवाइन के बीज का अर्क भी गठिया और यूरिक एसिड की समस्या दूर करने का एक प्रसिद्ध प्राकृतिक उपचार है अजवाइन के बीज का इस्तेमाल गठिया रोग के उपचार में लंबे समय से किया जाता रहा है अजवाइन में दर्द को कम करने, एंटीऑक्सीडेंट और डाइयूरेटिक गुण पाया जाता है तथा साथ ही इसे यूरेनरी एंटीसेप्टिक भी माना जाता है और कई दुर्लभ मामलों में नींद न आने की समस्या, व्याग्रता और नर्वस ब्रेकडाउन का उपचार भी इससे किया जाता है इसके बीज का इस्तेमाल जहां कई तरह के हर्बल सप्लीमेंट्स में किया जाता है वहीं इसकी जड़ भी काफी उपयोगी होती है-इसलिए आप अपने भोजन पकाने में अजवाइन का अवश्य ही इस्तेमाल करें-

3- बाजार में बिकने वाले बेकरी के फूड स्‍वाद में तो लाजबाव होते है लेकिन इसमें सुगर की मात्रा बहुत ज्‍यादा होती है इसके अलावा, इनके सेवन से शरीर में यूरिक एसिड़(Uric Acid)भी बढ़ जाता है अगर आपको यूरिक एसिड कम करना है तो आप पेस्‍ट्री और केक खाना बंद कर दें-

4- भोजन की हर दिन ली जाने वाली खुराक में कम से कम 500 ग्राम विटामिन सी जरूर लें चूँकि विटामिन सी, हाई यूरिक एसिड को कम करने में सहायक होता है और यूरिक एसिड को पेशाब के रास्‍ते निकलने में भी मदद करता है यकृत की शुद्धि के लिए नींबू अक्सीर है इसलिए नींबू का साईट्रिक ऐसिड(Citric acid)भी शरीर में बनने वाले यूरिक एसिड का नाश करता है दो नीबू को आप सुबह पानी में मिला कर तथा दोपहर में दो नीबू पानी से ले और हो सके तो रात को भी दोहराए आपको एक हफ्ते में ही फर्क महसूस होने लगेगा पन्द्रह दिन बाद आप सिर्फ दो नीबू का पानी सुबह ही लेते रह सकतें है आपका यूरिक एसिड कंट्रोल में रहेगा-

5- वैसे तो शरीर में यूरिक एसिड  की मात्रा बढने पर इसे कम करना इतना आसान नहीं होता है लेकिन यदि शतावर(Asparagus)की जड़ का चूर्ण 2-3 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन दूध या पानी के साथ लिया जाए तो यूरिक एसिड घटना प्रारम्भ हो जाता है और शरीर की कमजोरी भी दूर होती है-

6- सेब का सिरका(Apple Vinegar)भी रक्त का पी एच वैल्यू बढ़ाकर हाई यूरिक एसिड लेवल को कम करता है पर ध्यान रहे कि सेब का सिरका कच्चा और बिना पानी मिला और बिना पाश्चरीकृत होना चाहिए आप इसे किसी भी हेल्थ फूड स्टोर से आप इसे आसानी से हासिल कर सकते हैं-

7- लाल शिमला मिर्च,टमाटर,ब्लूबेरी, ब्रोकली और अंगूर एंटीऑक्सीडेंट विटामिन का बड़ा स्रोत है एंटीऑक्सीडेंट विटामिन फ्री रेडिकल्स अणुओं को शरीर के अंग और मसल टिशू पर आक्रमण करने से रोकता है जिससे यूरिक एसिड का स्तर कम होता है दैनिक जीवन में आप इसे उपयोग में अवश्य लें-

8- चेरी में एंटी इंफ्लामेट्री प्रॉपर्टी होती है जो यूरिक एसिड को मात्रा को बॉडी में नियंत्रित करती है हर दिन 10 से 40 चेरी का सेवन करने से शरीर में उच्‍च यूरिक एसिड की मात्रा नियंत्रित रहती है लेकिन एक साथ सभी चेरी न खाएं बल्कि आप इसे थोड़ी-थोड़ी देर में खाएं-

Upcharऔर प्रयोग-

20 मार्च 2017

यूरिक एसिड क्रिस्टल का ज्वाइंट में जमा होना

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यूरिक ऐसिड(Uric Acid)बढ़ जाता है तो वह बहुत नन्हें-नन्हे क्रिस्टलों के रूप में जमा हो जाता है ये हड्डियों मे ख़ासतौर से जोड़ों(Joint)के आस पास जमा होता है ये क्रिस्टल(Crystals)बहुत ही धारदार होते हैं जो की जोड़ों की चिकनी झिल्ली में चुभते हैं तथा चुभन और भयंकर दर्द पैदा करते हैं संधिवात(Arthritis)के कारण जोड़ों को घुमाने या गति उत्पन्न करने में कठिनाई महसूस होती है ठंडी या शीत हवाओं के कारण पीड़ा बढ़ जाती है इसकी सबसे बड़ी पहचान यह है कि इसमें रात में दर्द बढ़ जाता है और सुबह शरीर अकड़ता है-
यूरिक एसिड क्रिस्टल का ज्वाइंट में जमा होना

यदि किसी व्यक्ति की किडनी भीतरी दीवारों की लाइनिंग क्षतिग्रस्त हो तो ऐसे में यूरिक एसिड(Uric Acid)बढने की वजह से किडनी में स्टोन भी बनने लगता है यूरिक एसिड(Uric Acid)के असंतुलन से ही गठिया जैसी समस्‍याएं हो जाती है उच्‍च यूरिक एसिड की मात्रा को नियंत्रित करना अति आवश्‍यक होता है यूरिक एसिड नियंत्रण के लिए इसके बढ़ने के कारण को जानना आवश्‍यक है-

अगर आपको यह समस्‍या आनुवांशिक है तो इसे बैलेंस किया जा सकता है लेकिन अगर शरीर में किसी प्रकार की दिक्‍कत है जैसे-किडनी का सही तरीके से काम न करना आदि तो डॉक्‍टरी सलाह लें और दवाईयों का सेवन करें- 

शरीर में हाई यूरिक एसिड(High Uric Acid)का अर्थ होता है कि आप जो भी भोजन ग्रहण करते है उसमें प्‍यूरिन की मात्रा में कमी है जो शरीर में प्‍यूरिन की बॉन्डिंग को तोड़ देती है और यूरिक एसिड(Uric Acid)बढ़ जाता है-

यूरिक एसिड(Uric Acid)को नियंत्रित कैसे करें-


1- अगर शरीर में यूरिक एसिड(Uric Acid)की मात्रा लगातार बढ़ती है तो आपको भरपूर फाइबर वाले फूड खाने चाहिए जैसे-दलिया, पालक, ब्रोकली आदि के सेवन से शरीर में यूरिक एसिड की मात्रा नियंत्रित हो जाती है तथा साथ ही यह प्रयास भी करें कि अधिक से अधिक मात्रा में पानी पीया जाए इससे रक्त में मौजूद अतिरिक्त यूरिक एसिड मूत्र के द्वारा शरीर से बाहर निकल जाता है-

2- यूरिक एसिड बढ़ गया है और यदि दर्द बहुत ज्यादा है तो दर्द वाले स्थान पर बर्फ को कपडे मे लपेट कर सिंकाई करने से काफी फायदा होता है-

3- आप अपने खान-पान की आदत बदलें तथा शरीर में जमा अतिरिक्त यूरिकएसिड(Uric Acid)को उदासीन करने के लिए खानपान में क्षारीय पदार्थों की मात्रा को बढ़ाना चाहिए तथा फलों, हरी सब्जियां, मूली का जूस, दूध, बिना पॉलिश किए गए अनाज इत्यादि में अल्कली की मात्रा अधिक होती है-

4- शरीर में यूरिक एसिड(Uric Acid)की मात्रा को कम करने के लिए हर दिन 500 मिलीग्राम विटामन सी लें बस एक दो महीने में यूरिक एसिड काफी कम हो जाएगा-

5- यह सच है कि जैतून के तेल में बना हुआ भोजन भी शरीर के लिए लाभदायक होता है चूँकि इसमें विटामिन ई भरपूर मात्रा में होता है जो खाने को पोषक तत्‍वों से भरपूर बनाता है और यूरिक एसिड को कम करता है इसलिए खाना बनाने के लिए बटर या वेजटेबल ऑयल के बजाए कोल्ड प्रेस्ड जैतून के तेल का इस्तेमाल करें तेल को गर्म कर देने पर इससे जल्द ही दुर्गध आने लगती है दुर्गधयुक्त फैट शरीर के विटामिन ई को नष्ट कर देता है यह विटामिन यूरिक एसिड के लेवल को नियंत्रित करने के लिए आवश्यक होता है जैतून के तेल के इस्तेमाल से शरीर में अतिरिक्त यूरिक एसिड(Uric Acid)नहीं बनेगा-




Upcharऔर प्रयोग-

यूरिक ऐसिड बढ़ने कारण क्या है

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भोजन के रूप मे लिए जाने वाले प्रोटीन प्युरीन(Purine protein)और साथ मे उच्च मात्रा मे शर्करा(Glucose)का लिया जाना रक्त मे यूरिक एसिड(Uric Acid)की मात्रा को बढाता है तथा कई लोगों मे वंशानुगत कारणों को भी यूरिक एसिड के ऊँचे स्तर के लिए जिम्मेदार माना गया है गुर्दे द्वारा सीरम यूरिक एसिड(Uric Acid)के कम उत्सर्जन के कारण  भी इसका स्तर रक्त(Blood) मे बढ़ जाता है-
यूरिक ऐसिड बढ़ने कारण क्या है

उपवास या तेजी से वजन घटाने की प्रक्रिया मे भी अस्थायी रूप से यूरिक एसिड(Uric Acid)का स्तर आश्चर्यजनक स्तर तक वृद्धि कर जाता हैं रक्त आयरन की अधिकता भी यूरेट स्तर को बढ़ाती है जिस पर आयरन त्याग यानी रक्तदान(Blood donation)से नियंत्रण किया जा सकता है पेशाब बढ़ाने वाली दवाएं या डायबटीज़ की दवाओं के प्रयोग से भी यूरिक ऐसिड(Uric Acid) बढ़ सकता है-

उच्च यूरिक एसिड(High Uric acid)के नुकसान-


इसका सबसे बड़ा नुकसान है शरीर के छोटे जोड़ों मे दर्द जिसे गाउट रोग के नाम से जाना जाता है मान लो आप की उम्र 25 वर्ष से ज्यादा है और आप उच्च आहारी हैं रात को सो कर सुबह जागने पर आप महसूस करते है कि आप के पैर और हाथों की उँगलियों अंगूठों के जोड़ो मे हल्की हल्की चुभन जैसा दर्द है तो आप को यह नहीं मान लेना चाहिये कि यह कोई थकान का दर्द है हो सकता है कि आप का यूरिक एसिड स्तर बड़ा हुआ हो-

अगर कभी आपके पैरों की उंगलियों, टखनों और घुटनों में दर्द हो तो इसे मामूली थकान की वजह से होने वाला दर्द समझ कर अनदेखा न करें यह आपके शरीर में यूरिक एसिड बढने का लक्षण हो सकता है इस स्वास्थ्य समस्या को गाउट आर्थराइट्स(arthritis)कहा जाता है-

यूरिक एसिड गठिया(Arthritis)का रूप भी है-


गाउट एक तरह का गठिया रोग(Rheumatism)ही होता है जिस के कारण शरीर के छोटे ज्वाइंट प्रभावित होते हैं और विशेषकर पैरों के अंगूठे का जोड़ और उँगलियों के जोड़ व उँगलियों मे जकड़न रहती है-

इससे एड़ी, टख़ने, घुटने, उंगली, कलाई और कोहनी के जोड़ भी प्रभावित हो सकते हैं इसमें बहुत दर्द होता है जोड़ पर सुर्ख़ी और सूजन आ जाती है और बुख़ार भी आ जाता है  यह शरीर में यूरिक ऐसिड(Uric Acid)के बढ़ने से पैदा होती है-

यह बढ़ा हुआ यूरिक एसिड रक्त के साथ शरीर के अन्य स्थानों मे पहुँच जाता है खास तौर पर हड्डियों के संधि भागों मे जाकर रवा के रूप मे जमा होना शुरू हो जाता है  फिर ये साध्य रोग शरीर के छोटे जोड़ों मे दर्द गाउट Gout को यह  जन्म देती है-


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