23 सितंबर 2018

ल्यूकोडर्मा का आयुर्वेदिक उपचार

Ayurvedic Treatment of Leukoderma


ल्यूकोडर्मा (Leucoderma) एक प्रकार का त्वचा का रोग है जिसमें त्वचा के रंग में सफेद चकते पड़ जाते हैं ल्यूकोडर्मा यानी की सफेद दाग के नाम से भी जानते है धीरे-धीरे यह दाग बढ़ने लगते हैं यह दाग हाथों, पैरों, चेहरे, होठों आदि पर छोटे रूप में होते हैं फिर ये बडे़ सफेद दाग का रूप ले लेते हैं-


ल्यूकोडर्मा का आयुर्वेदिक उपचार

हमने पिछली पोस्ट में आपको बताया था कि ल्यूकोडर्मा (Leukoderma) क्या है इसके लक्षण कारण और क्या आहार लें इस पोस्ट में हम आपको इसके इलाज के लिए कुछ आयुर्वेदिक उपचार से अवगत कराते है-जब आप सभी प्रकार से और हर तरह से इलाज करके निराश हो गए हों तब आप ये दवाई जरूर एक बार प्रयोग करे-

सफ़ेद दाग (Leucodermaके कुछ आयुर्वेदिक प्रयोग-


सामग्री-

बावची (Psoralea Corylifolia)150 ग्राम
खैर की छाल (Catechu Bark)- 650 ग्राम
परवल की जड़- 300 ग्राम
देशी गाय का घी- 800 ग्राम
भृंगराज- 40 ग्राम
जवासा- 40 ग्राम
कुटकी- 40 ग्राम
गूगल- 80 ग्राम

बनाने की विधि-


1- सबसे पहले आप 650 ग्राम खैर की छाल व 150 ग्राम बावची (Psoralea Corylifoliaको मोटा-मोटा कूट कर रख ले अब इसके बाद 150 ग्राम बावची, भृंगराज, परवल व जवासे को भी बारीक पीस ले और अब गूगल के छोटे टुकड़े बना ले-

2- इसके बाद 650 ग्राम खैर की छाल + 150 ग्राम बावची को 6.500 किलो पानी मे पकाए आप इसे धीमी आग पर पकाए और जब लगभग 1/500 (डेढ़ किलो) ग्राम पानी रह जाए तब आप इसे छान ले तथा ठंडा होने पर जो बचा हुआ अंश है उसे कपड़े मे से निचोड़ ले अब यह काढ़ा साफ बर्तन मे एक रात के लिए रख ले तथा सुबह ऊपर का साफ पानी निथार ले और जो अंश नीचे बैठ जाए उसे आप छोड़ दे-

3- अब एक पीतल की कली की हुई कड़ाही(ना मिले तो लौहे की कड़ाही)मे 800 ग्राम देशी घी व का 1/500 (डेढकिलो) काढ़ा व बाकी बारीक पीसा हुआ पाउडर व गूगल के टुकड़े मिलाकर धीमी आग पर फिर पकाए तथा बीच-बीच में इसे कड़छी से हिलाते रहे-कुछ समय बाद कड़ाही मे नीचे काला काला चिपचिपा अंश दिखाई देगा इसे एक सलाई पर रुई लपेट कर इस पर घी लगाए तथा इस घी लगी रुई को जलाए-यदि चटर-चटर की आवाज आए तो समझे अभी पकाना बाकी है और यदि बिना किसी आवाज के रुई जल जाए तो फिर आग बंद कर दे-जब लगभग सारा पानी जल जाए और केवल घी रह जाए तो आग बंद कर दे-उसके बाद कड़ाही के हल्का ठंडा होने पर ध्यान से घी को एक सूखे बर्तन मे निकाल ले-

4- ध्यान ये रखना होगा कि घी पकाते समय मिश्रण पूरी तरह न जले और जब तली मे शहद जैसा गाढ़ा बच जाए तब आग बंद करके घी को आप अलग कर ले-घी अलग करते समय बर्तन मे जरा सा काले रंग का काढ़ा भी आ जाता है इसलिए बर्तन से घी को एक चौड़े मुंह की काँच की शीशी मे डाल ले-

प्रयोग विधि-

यह घी लगाने व खाने मे प्रयोग करे जिसको रोग कम हो उसे एक समय व जिसे रोग अधिक हो उसे सुबह नाश्ते के बाद व रात को सोने से पहले प्रयोग करे-

मात्रा (Quantity)-

आप 10 ग्राम छोटे बच्चो को भी दे सकते हैं या कम मात्रा मे तथा इसको लगाने से कुछ दिन के बाद दाग का रंग बदलने लगता है यदि इसको लगाने से जलन हो तो बीच-बीच मे इसका प्रयोग बंद कर दे उस समय नारियल का तेल लगाए तथा बाद मे जब जलन शांत हो जाए तब फिर दवाई लगाना शुरू कर दे यदि दाग पर दवाई लगाकर ऊपर किसी भी पेड़ का पत्ता रख कर बांधने से जल्दी लाभ होता है- 

किसी किसी को इस दवाई के लगभग 20 दिन के प्रयोग के बाद शरीर मे जलन व गर्मी महसूस होने लगती है तब इसे बीच मे बन्द कर दे इस दवाई के समय नारियल खाने व नारियल का पानी पीने से जलन नहीं होती है-

विटिलिगो (Vitiligo) के लिए आयुर्वेदिक योग-


40 ग्राम मूली के पिसे हुए बीज को 60 ग्राम सिरके में एक कांच के बर्तन में डाले तथा इसमें एक ग्राम संखिया भी पीस कर डाल दे अब इसे रात भर खुले आसमान के नीचे खुला रक्खे ताकि ओस की बुँदे इसमें गिरते रहे और सुबह इस बर्तन को उठा ले अब इस दवा को सोते समय सफ़ेद दागो पर लगाए बस ध्यान रहे इसे आँखों के आस पास न लगाए न हो होठो पे लगाए क्युकि इसमें संखिया है जो कि एक विष है -

होठो पर सफ़ेद दाग (Leukoderma) प्रयोग करे-


गंधक, लाल चीता (चित्रक) की जड़, हरताल, त्रिफला बराबर की मात्रा में ले इन सब को जल में घोटकर गोली बना ले और छाया में सुखा ले और अब इस गोली को जल में घिस कर लेप को दाग पर रोज लगाए-

श्वेत कुष्ठ (Leukoderma) पर एक अन्य प्रयोग-


100 ग्राम हल्दी तथा 100 ग्राम बाकुची (Psoralea Corylifoliaके बीज को पीस कर 1500 मिलीलीटर पानी में पकाए जब पानी लगभग 300 ग्राम बचे तब इसमें 150 ग्राम सरसों का तेल डालकर फिर पकाए जब सारा पानी जल जाए और तेल मात्र बचे तब उतार ले तथा ठंडा होने पर कांच की शीशी में भर कर रख ले सुबह-शाम इस तेल को सफ़ेद दागों पर लगाने से लाभ  होता है-

एक और सरल प्रयोग-


आप बावची (Psoralea Corylifolia) का एक  दाना सुबह पानी से खाली पेट ले फिर अगले दिन दो  दाने ले बस इसी तरह एक-एक करके आप बढ़ाते हुए 21 तक बढ़ाए तथा फिर एक-एक कम करते हुए वापस एक दाने पर ले आए फिर दोबारा बढ़ाते हुए एक से 21 तक व 21 से 1 तक ले आए-यह प्रयोग 3-4 बार करने से सफ़ेद दाग ठीक हो जाते हैं इस प्रयोग से कभी कभी बीच मे गर्मी लगने लगे तो फिर आगे ना बढ़ाए बस आप वहीं से कम करना शुरू कर दे वैसे नारियल का पानी पीने व नारियल की गिरि खाने से गर्मी लगने कि समस्या कम हो जाती है अधिक लाभ के लिए रात को 2 कप पानी मे 2 चम्मच आंवला चूर्ण डाल दे और सुबह छान कर इस पानी से बावची के दाने ले तो गर्मी नहीं लगती-

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ल्यूकोडर्मा का होम्योपैथी इलाज

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ल्यूकोडर्मा होने पर आहार और योग

Diet and Yoga on Leucoderma


ल्यूकोडर्मा (Leukoderma) क्या है और होने के क्या लक्षण और कारण होते है इसके बारे में हमने अपनी पिछली पोस्ट में आपको अवगत कराया था कई रोगी जानना चाहते है कि ल्यूकोडर्मा होने पर किन-किन चीजों को खाना चाहिए और किन चीजों से परहेज करें तो आपकी जानकारी के लिए हम इस लेख में आपको बता रहें है-

ल्यूकोडर्मा होने पर आहार और योग

ल्यूकोडर्मा (Leukoderma) पर क्या आहार लें-


1- ल्यूकोडर्मा (Leukoderma) होने पर रोगी को लगभग एक हफ्ते तक सिर्फ फलों के रस पर आधारित रहना चाहिए तथा एक हफ्ते बाद रोगी को ताज़े फल, सब्जियां या उबली हुई सब्जियां और अनाज पर आधारित रहना चाहिए लेकिन आप दूध व दही कुछ दिनों बाद ही आहार में सम्मिलित कर सकते हैं इसके बाद रोगी अपने आहार में बीज़, अनाज़, फल व सब्जियों को सम्मिलित करें आप अपने आहार में शहद का उपयोग भी कर सकते हैं अब यह पूरा आहार चक्र हर दो महीनों में रिपीट करें-

2- आप अपने आहार में पालक, सोया मिल्क, अदरक, मेवे आदि भी प्रचुर मात्रा में ले सकते है-


ल्यूकोडर्मा (Leukoderma) पर क्या आहार न लें-


ल्यूकोडर्मा से पीड़ित रोगी को बेरी और नाशपाती तथा माँसाहारी भोजन और जंक फ़ूड, चाय और कॉफ़ी, शराब, खट्टे आहार, सुगन्धयुक्त पेय, शक्कर, मैदे की बनी वस्तुओं के सेवन से बचना चाहिए-

योग और व्यायाम करें-


1- शारीरिक गतिविधि स्वच्छता में सहायक होती है इससे संतुलन आता है और तनाव घटता है इसके लिए पैदल चलना, दौड़ना, नृत्य करना, एरोबिक्स, जिमनास्टिक्स, स्ट्रेचिंग आदि करें तथा आप क्लोरीन रहित पानी में तैराकी भी कर सकते हैं-

2- गोमुखासन, वृक्षासन, प्राणायाम भी करें इससे आपको आश्चर्यजनक लाभ मिलेगा व्यायाम नियमित करें एवं स्वस्थ आहार लें इसके लिए आप अपने स्वास्थ्य सलाहकार से मिलें और सहयोग लें-

लाल मिटटी का प्रयोग-


रेड क्ले (लाल मिट्टी) के नाम से मिलने वाली नदी किनारे या पहाड़ी इलाकों से मिल जाती है यह भी श्वेतदाग को कम करने के लिए एक असरदार उपाय है आप इस मिट्टी को अदरक के रस में 1:1 की मात्रा में मिलाएं और श्वेतदाग की जगह पर दिन में एक बार लगाएं इस मिट्टी के अंदर कॉपर स्किन के पिगमेंट को वापस लाने में मदद करता है तथा अदरक का रस उस जगह पर रक्त संचार बढ़ाता है साथ ही तांबे के बर्तन में रात भर रखा हुआ पानी भी पीने से इस रोग को कम करने में मदद मिलती है-

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ल्यूकोडर्मा होने के कारण और लक्षण

Causes and symptoms of Leucoderma


हर मनुष्य की स्किन के अंदर एक वर्णक होता है जिसे मेलेनिन (Melanin) कहते हैं इसी मेलेनिन के कारण आपकी स्किन का रंग निर्धारित होता है जादा वर्णक होने से आपका रंग काला होता है और इसकी कमी के कारण आपका कलर गोरा या साफ़ रंग का होता है यही मेलेनिन आपकी स्किन और आपकी बॉडी के दूसरे अंगों को सूर्य की हानिकारक किरणों से बचा कर आपको स्किन कैंसर जैसे बीमारी से भी बचाता है-

ल्यूकोडर्मा होने के कारण और लक्षण

विटिलिगो तब होता है जब मेलेनिन उत्पादन करने वाली कोशिकाएँ नष्ट हो जाती हैं या और अधिक मेलेनिन उत्पादित नहीं करतीं हैं जिसके कारण त्वचा पर असमान आकृति के धीमे-धीमे बढ़ते हुए सफ़ेद दाग दिखाई देते हैं यही विटिलिगो (Vitiligo) या ल्यूकोडर्मा (Leucoderma) होने के पीछे का कारण होता है इस मेलेनिन की कमी होने के लिए कई कारण और कारक जिम्मेदार होते हैं-आइये जानते है मुख्य कारण और लक्षण के बारे में-

वैसे इस चर्म रोग का सही कारण आज भी किसी को नहीं पता है लेकिन कुछ लोग इसे ख़राब खान-पान  ग़लत फ़ूड कम्बीनेशन (food combination) के कारण भी होना मानते हैं जैसे-मछली के साथ दूध का सेवन, कददू  के साथ दूध पीना,  प्याज़ के साथ दूध पीना आदि-

ऐसा सोचना ग़लत भी नहीं है किसी हद तक ये बात सही भी है कि सही खान पान न होने से भी ये प्राब्लम आपको हो सकती है क्योंकि जो आप खाते हैं उसका असर आपकी त्वचा की सेहत पर भी पड़ता है-

आनुवांशिक या जेनेटिक  कारण-


1- तीस से पैतीस प्रतिशत लोगो में  विटिलिगो (Vitiligo) का कारण आनुवंशिक गुण ही होता है तथा कुछ लोगों में सूर्य की हानिकारक किरणों के कारण भी ये होता है -

2- मानसिक तनाव (Stress), चिंता (Anxiety) और डिप्रेशन (Depression) या स्किन पर चोट लगने से तथा पेट की गड़बड़ी के कारण भी विटिलिगो होता है-

3- लिवर की कार्यक्षमता में कमी या पीलिया (Jaundice) या लिवर प्राब्लम होना या पाचन तंत्र में कीड़े होना भी इसका एक कारण होता है-

4- कुछ लोगों में अत्यधिक पसीना आने से या कार्य पर्णाली में गड़बड़ी होने से भी ये रोग पाया जाता है-

5- मधुमेह, अतिगलग्रंथिता, एडिसन रोग या कोई और स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्या होने के कारण भी पाया जाता है-

6- जलने के कारण स्किन को होने वाले नुकसान के कारण विटिलिगो (Vitiligoहोता है-

7- खून में खराबी या कैल्शियम की कमी अथवा त्वचा पर टैटू या स्टीकर का प्रयोग करवाना, स्टेरॉयड के इंजेक्शन का प्रयोग, तंग, चुस्त कपड़े पहनना भी इसका एक कारण होता है-

ल्यूकोडर्मा (Leukoderma) या होने के लक्षण-


1- त्वचा पर छोटा सफेद दाग जो समय के साथ बढ़ता जाता हो या बालों का समय के पहले सफ़ेद होना या बालों का झड़ना-

2- सूर्य के प्रकाश के सामने आने पर त्वचा में उत्तेजना का होना-

3- दाग पर स्थित बालों का भी सफ़ेद हो जाना तथा ठन्डक के प्रति संवेदनशीलता, अवसाद तथा कमजोरी और थकावट-

सफ़ेद दाग (Leucoderma) में ध्यान दें-


1- कॉस्मेटिक प्रसाधन जैसे क्रीम और पाउडर के प्रयोग बंद कर दे ध्यान रहें पर्फ्यूम, डियोड्रेंट, हेयर डाई, पेस्टिसाइड को शरीर को सीधे शरीर के संपर्क में आने से बचाएं-

2- तेज केमिकल वाले साबुन और डिटर्जेंट का इस्तेमाल न करें पीड़ित व्यक्ति तनाव से बचे और आराम करे तथा नहाते समय अत्यधिक साबुन के प्रयोग से बचे सुबह के समय 20 से 30 मिनिट धुप का सेवन (धुप स्नान) करे-

3- खाने में लोहतत्व युक्त पदार्थ जैसे मांस, अनाज, फलीदार सब्जियां, दालें व हरी पत्तेदार सब्जियों का सेवन करे-

4- खट्टी चीजें जैसे- नीबू, संतरा, आम, अंगूर, टमाटर, आंवला, अचार, दही, लस्सी, मिर्च, मैदा, उड़द दाल न खाएं-

5- सफ़ेद दाग के इलाज के दौरान नमक और खारयुक्त पदार्थों का सेवन भी पूरी तरह बंद रखे-नमक, मूली और मांस के साथ दूध न पीएं तथा मांसाहार और फास्ट फूड भी कम खाएं-

6- नित्यप्रति ताजा गिलोय या एलोविरा जूस पीना चाहिए इससे आपकी इम्यूनिटी बढ़ती है-

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ल्यूकोडर्मा होने पर आहार और योग

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ल्यूकोडर्मा या विटिलिगो क्या है

What is Leukoderma or Vitiligo


ल्यूकोडर्मा (Leukoderma) या विटिलिगो एक प्रकार का त्वचा का रोग है जिसमें त्वचा के रंग में सफेद चकते पड़ जाते हैं ल्यूकोडर्मा यानी की सफेद दाग के नाम से भी जानते है ये शरीर के जिस हिस्से में होता है उसी जगह सफेद रंग के दाग बनने लगते हैं धीरे-धीरे यह दाग बढ़ने लगते हैं यह दाग हाथों, पैरों, चेहरे, होठों आदि पर छोटे रूप में होते हैं फिर ये बडे़ सफेद दाग का रूप ले लेते हैं-

ल्यूकोडर्मा या विटिलिगो क्या है

ल्यूकोडर्मा (Leukoderma) नामक संक्रामक रोग छोटे बच्चों को भी हो सकता है सफेद दाग का इलाज आयुर्वेद में उपल्ब्ध है अब आपको परेशान होने की जरूरत नहीं है आयुर्वेद के अनुसार पित्त दोष की वजह से सफेद दाग की समस्या होती है आज समाज में यह लोगों में एक धारणा बन गई है कि यह कुष्ठ रोग है पर यह कुष्ठ रोग नहीं होता है और यह न तो कैंसर है और न ही किसी प्रकार का कोढ़ होता है-

सफेद दाग या श्वेत कुष्ठ एक त्‍वचा रोग है इस रोग के रोगी  के बदन पर अलग-अलग स्‍थानों पर अलग-अलग आकार के सफेद दाग (Vitiligo) आ जाते हैं पूरे वि‍श्‍व में दो से तीन प्रति‍शत लोग इस रोग से प्रभावि‍त हैं लेकि‍न इसके विपरीत भारत में इस रोग के शि‍कार लोगों का प्रति‍शत चार से पांच है तथा राजस्‍थान और गुजरात के कुछ भागों में पांच से आठ प्रति‍शत लोग इस रोग से ग्रस्‍त हैं शरीर पर सफेद दाग (Vitiligo) आ जाने को लोग इसे एक कलंक के रूप में देखने लगते हैं और कुछ लोग भ्रम-वश इसे कुष्‍ठ रोग मान बैठते हैं-

इस रोग से पीड़ित लोग ज्यादातर हताशा (Frustration) में रहते है उनको लगता है कि समाज ने उनको बहि‍ष्‍कृत किया हुआ है इस रोग के एलोपैथी और अन्‍य चि‍कि‍त्‍सा-पद्धति‍यों में इलाज हैं शल्‍य चि‍कि‍त्‍सा से भी इसका इलाज कि‍या जाता है लेकि‍न ये सभी इलाज इस रोग को पूरी तरह ठीक करने के लि‍ए संतोषजनक नहीं हैं इसके अलावा इन चि‍कि‍त्‍सा-पद्धति‍यों से इलाज बहुत महंगा है और उतना कारगर भी नहीं है-रोगि‍यों को इलाज के दौरान फफोले और जलन पैदा होती है इस कारण बहुत से रोगी इलाज बीच में ही छोड़ देते हैं-

सफेद दाग (Vitiligo) जिसे कि आयुर्वेद में श्वेत कुष्ठ के नाम से भी जानते है एक ऐसी बीमारी है जिससे कोई भी व्यक्ति बचना चाहेगा इस बीमारी मैं व्यक्ति की त्वचा पर सफेद चकते बनने प्रारंभ हो जाते है और कई बार यह पूरे के पूरे शरीर पर फैल जाती है वैसे विटिलिगो नामक इस बीमारी का कुष्ठ रोग से कोई लेना देना नहीं है जहां कुष्ठ रोग का प्रमुख लक्षण ही त्वचा मैं संवेदना खत्म होना या सूनापन होना होता है वहीं त्वचा में से रंग का अनुपस्थित होना कभी कभार ही होता है बल्कि अधिकतर बार त्वचा सामान्य रंग की ही होती है सफेद चक्तों को दूर करने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है कि आप अपनी जीवन शैली और खान पान में परिवर्तन लायें-

अधिक जानकारी के लिए इस वेबसाईट में दी गई ल्यूकोडर्मा (Leukoderma) या विटिलिगो की पूरी सीरिज को अवश्य ही पढ़े ताकि आप घर बैठे इसका सफल उपचार कर सकें-

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22 सितंबर 2018

गर्दन की सभी तकलीफों के लिए


गर्दन में जकड़न, सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस, गर्दन का दर्द, गर्दन हिलाते समय दर्द होना, हड्डियों से आवाज आना, हाथों में कंधों में दर्द, नसे ब्लॉक होना, हाथों का काँपना, हाथ सुन्न होना, सर में भारी पन, डिजी नेस, सर दर्द, चक्कर आना, बैलेंसिंग प्रॉब्लम, जैसी समस्याओं पर...

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गर्दन की सभी तकलीफों के लिए

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21 सितंबर 2018

रंग चिकित्सा क्या है

What is Color Therapy


विभिन्न रंगों का हमारे मूड, स्वभाव, स्वास्थ तथा मनोभावों पर पड़ने वाले प्रभाव हमेशा ही वैज्ञानिकों, चिकित्सकों तथा  फैशन इंडस्ट्री से जुड़े लोगों के लिए अध्ययन व कुतूहल का विषय रहा है कलर (Colors) या रंग एक दृश्य प्रकाशीय ऊर्जा है जिसका हमारे मन मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ता है आधुनिक शोध से यह पता चला है कि रंग व प्रकाशीय किरणे जब हमारे शरीर मे प्रविष्टि होती है तब वो किरणे हमारी पिट्यूटरी व पिनियल ग्रन्थियों को उत्तेजित करती है जिसका प्रभाव हमारे शरीर के हार्मोन्स पर पड़ता है नर्वस सिस्टम शांत होती है जिसके मन मस्तिष्क को शांत बनाकर तन व मन को प्रफुल्लित बना रहता है-

रंग चिकित्सा क्या है

भारतीय प्राचीन चिकित्सा पद्धिति आयुर्वेद ने तो इस रहस्य को सदियों पहले ही पहचान लिया था इसीलिए कुछ विशिष्ट रंगो के वस्त्रों, भोजन तथा अन्य सामग्रियों को दैनिक जीवन तथा धार्मिक विधियों में विशिष्ट स्थान दिया गया था-

आयुर्वेदिक चिकित्सा में भी रंगों को विशिष्ट स्थान दिया गया है पंचमहाभूतों के नियम में हर तत्व का अपना एक विशिष्ट रंग माना गया है हर महत्वपूर्ण अंग (Vital Organs) तथा हर एक भावना व मनोभाव का अपना एक विशिष्ट रंग निश्चित किया गया है जिसके द्वारा हम उस रंग के जरिये शरीर मे उस तत्व की पूर्ति करके शारीरिक व मानसिक व्याधियों की चिकित्सा कर सकते है-

रंग चिकित्सा (Color Therapy) कैसे उपयोग होती है-


1- विशिष्ट ऋतुओं तथा विशिष्ट व्याधियों में विशिष्ट रंग के वस्त्र या आभूषण पहन कर-

2- विभिन्न रँगो की कांच की बोतल में पानी भरकर उसे सूर्य किरणों की ऊर्जा से सिद्ध कर वो पानी पीना-

3- विभिन्न रंग की लाइट रेडिएशन्स शरीर के विभिन्न अंगों पर लेकर-

4- विभिन्न रंग के हीरे, पत्थर, या क्रिस्टल धारण करके-

5- शरीर पर विशिष्ट कर हाथों की हथेलियों पर विभिन्न स्थानों पर विशेष रंग के पेच लगाकर हम रंग चिकित्सा का आसानी से उपयोग कर सकते है-

6- जब हम हथेलियों पर रंग लगाते है तब उसे स्केचपेन से लगाए तथा कम से कम 4 घण्टे उसे लगे रहने दे उसके बाद धो डालें-

7- इस तरह रंग चिकित्सा से हम शारीरिक व्याधियों तथा मानसिक व्याधियों की आसान व निराप्रद तरीके से चिकित्सा घर बैठे कर सकते है-


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चेहरे की त्वचा के लिए एक नेचरल स्क्रब


एक चम्मच टेबल सॉल्ट या नमक और एक चम्मच पेट्रोलियम जेली (वैसलीन) दोनों को मिलाकर चहेरे पर स्क्रब करने से मृत त्वचा, ब्लैकहेड्स, व्हाइट हेड्स दूर होकर चहेरा साफ बेदाग और कोमल बनता है तथा चेहरे की रंगत भी निखरती है-

चेहरे की त्वचा के लिए एक नेचरल स्क्रब

इसके लिए सबसे पहले आप चहेरे पर भाँप या स्टीम ले अथवा गर्म पानी से चहेरा धो ले जिससे त्वचा नरम हो कर डेड स्किन (Dead skin) जल्दी निकल सकेगी-

चेहरे की त्वचा के लिए नेचरल स्क्रब

इसके बाद एक चम्मच नमक तथा एक चम्मच पेट्रोलियम जैली मिलाकर चहेरे पर लगाए तथा हल्के दबाव देकर गोल-गोल मसाज करें इस तरह करने से त्वचा की मृत कोशिकाएं हट जाती है त्वचा की अंदर से सफाई होती है जिससे कील मुहाँसे नही होते व त्वचा में ताजगी आती है-


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धूम्रपान एक शास्त्रोक्त आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति है


धूम्रपान (Smoke) आयुर्वेदिक चिकित्सा कर्म है आचार्य चरक, वाग्भट तथा आचार्य सुश्रुत, आचार्य शारंगधर ने विविध प्रकार के धूम्र सेवन तथा उससे होने वाले लाभ वर्णित किए हैं शास्त्रोक्त विधि से धूम्रपान करने से मस्तिष्क, फेफड़े, सर, नासीका, तथा छाती संबंधित रोगो का नाश होता है इसलिए महर्षि शारंगधर कहते हैं नस्य कर्म के बाद धूम्र सेवन विधि आवश्यक है-

धूम्रपान एक शास्त्रोक्त आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति है

आयुर्वेद के हिसाब से धूम्र सेवन 12 वर्ष से लेकर 80 वर्ष की आयु के व्यक्तियों ने करना चाहिए-योग्य तरीके से औषिधि द्रव्यों के साथ किया हुआ धूम्र सेवन सर्दी, गर्दन, गले, आंख, नाक, कान ,तथा सिर के रोग में अत्यंत लाभकारी है शास्त्रोक्त विधि से किया हुआ धूम्र सेवन वायु तथा कफ विकारों को दूर करता है-

महर्षि चरक कहते हैं धुम्रपान चिकित्सा से मनुष्य की समस्त इंद्रिया, वाणी तथा मन प्रसन्न रहता है सिर के बाल दांत तथा दाढ़ी मूंछ के बाल मजबूत होते हैं आंतर मुख सुगंधित रहता है याने किन्ही रोगों मुख से आ रही दुर्गंध दूर होती है-

धूम्रपान एक शास्त्रोक्त आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति है

धूम्रपान याने धुमस्य पानम अर्थात औषधि युक्त धुए का सेवन या ग्रहण करना इस क्रिया को धूम्रपान या धूम्र सेवन कहते हैं औषधीय द्रव्य के धुए को सूंघने से या त्वचा पर ग्रहण करने से औषधि के विशिष्ट गुण धर्म तथा गर्मी इन दोनों चिकित्सकीय तत्वों का एक साथ लाभ मिलता है हालांकि धूम्रपान यह एक शास्त्रोक्त आयुर्वेदिक चिकित्सा कर्म है लेकिन आज हम आपको सरल व सुलभ तथा कारगर प्रयोग बताएंगे जो आप घर में प्रयोग करके स्वास्थ्य लाभ ले सकते हैं-

शास्त्रोक्त धूम्रपान प्रयोग-


1- गाय का घी, गुग्गल तथा मोम को एक साथ मिलाकर आग में डाल दे और उसका धुँआ सूंघे इससे बार-बार छींक आना बंद हो जाता है-

2- अजवाइन को जलते कोयले पर डालकर उसका धुआं सूंघने से जुकाम के साथ-साथ नाक दर्द तथा पीनस की समस्या दूर होती है-

3- पीपल के सूखे पत्तों में थोड़ी अजवाइन भरकर बीड़ी की तरह उस का कश खींचने से पुराने से पुराना जुकाम, इन्फेक्शन तथा कफ की समस्याएं ठीक हो जाती है-

4- आम के पत्तों को जलाकर उसका धुआ पीने से गले के भीतरी दर्द में तथा टॉन्सिल्स में राहत मिलती है-

5- गूगल का धुआं कान पर लेने से कान पकने की समस्या वह कान से मवाद आने की समस्या दूर होती है वह दर्द में राहत मिलती है-

6- नजले में हींग और काली मिर्च का धुआं सुघने से आश्चर्यजनक रूप से लाभ मिलता है जिनकी सूंघने की शक्ति कम हो गई हो उनको यह प्रयोग प्रतिदिन जरूर करना चाहिए-

7- नीम की पत्ते छाल तथा अरंड के सूखे पत्ते का धुआं लेने से योनि दाहा श्वेत प्रदर तथा योनि के दर्द की समस्या दूर होती है-

8- दालचीनी, सोंठ, तेजपत्ता के धुए को सूंघने से आधा शीशी का दर्द ठीक हो जाता है-

9- पुरानी रूई को तिल के तेल में या गाय के घी में डुबोकर रखें इस के छोटे-छोटे टुकड़ों को कोयले पर रखकर जलाकर इसके धुए को एक नाक बंद करके दूसरे नाक से जोर लगाकर यह धुआं अंदर ले यह प्रयोग प्रतिदिन करने से आधासीसी माइग्रेन तथा कब्ज की वजह से सर चकराना, चक्कर आना, आंखें कमजोर हो जाना जैसी समस्याओं में आश्चर्यजनक रूप से लाभ मिलता है-

10- अगर बाल टूट रहे हो झड़ रहे हो डैंड्रफ की समस्या हो तो बड़ की जटा, पत्ते, नीम के पत्ते, उड़द की दाल, सहजन के पत्ते, तथा गुड़हल के फूल को जलते हुए कोयलों पर डालकर उसका धुआ सर में लेने से यह समस्याएं जड़ से खत्म हो जाती है लेकिन उच्च रक्तचाप वाले व्यक्तियों को यह प्रयोग नहीं करना चाहिए-

11- दशमुल, गाय का घी व सेंधा नमक इन को जलाकर इनका धुआं सुनने से शिरो वेदना में लाभ होता है-

नजला-जुकाम-खांसी-दमा-खरार्टे के लिए धूम्र सेवन चिकित्सा-


जौ (Barley) एक किस्म का अनाज होता है जो कुछ-कुछ गेहूं जैसा दिखता है आप इसे बाजार से लगभग 250 ग्राम जौ ले आएँ बस ध्यान रहे कि इसमे घुन न लगा हुआ हो इसे साफ कर ले तथा मंद मंद आग पर कड़ाही मे डाल कर भून ले और ध्यान रहे कि जले नहीं-इसके बाद इसे मोटा-मोटा कूट-पीस ले-

अब जरूरत के समय 1 बड़ा चम्मच जौ का चूर्ण लेकर उसमे 1 छोटा चम्मच देशी घी मिला कर तेज गरम तवे पर या तेज गरम लोहे की कड़छी मे डाल कर इसका धुआँ नाक से या मुँह से खींचें यदि लकड़ी के जलते हुए कोयले पर डाल कर धुआँ खींचे तो और भी अधिक लाभदायक है धुआँ लेने के 15 मिनट पहले और 2 घंटे बाद तक ठंडा पानी न पिए जब भी प्यास लगे तो गरम दूध पिए-

नोट- यदि बार बार मुँह सूखता हो और प्यास लगती हो तो ये प्रयोग न करें

लाभ-


नए जुकाम मे जब सिर भारी हो और नाक बंद तब यह प्रयोग करें और चमत्कार देखें 5 मिनट मे फायदा होगा-खांसी, दमे मे इन्हेलर कि तरह तत्काल फायदा दिखता है तथा खर्राटे मे प्रतिदिन ये धुआँ लें-

सुबह शाम किसी भी समय ले सकते हैं इसका कोई साइड इफेक्ट नहीं है बच्चों और गर्भवती महिलाओं के लिए भी सुरक्षित है अन्य दवाओं के साथ भी इसका प्रयोग किया जा सकता है-

बदलते मौसम मे स्वस्थ भी प्रयोग करें ताकि नजले जुकाम से बच सकें दिन मे 4 बार तक प्रयोग कर सकते हैं एक समय मे 4 बड़े चम्मच जौ व घी मिला कर प्रयोग कर सकते हैं-


विशेष सूचना-

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20 सितंबर 2018

कमर दर्द-पीठ दर्द-सायटिका व घुटनो के दर्द केे लिए प्रयोग

Use for  Waist Pain-Back Pain-Cytica and Knee Pain


कई लोगों को आजकल कमर दर्द (Waist Pain) पीठ दर्द-सायटिका व घुटनो के दर्द की शिकायत हो रही है तो मै आज आपके लिए एक अभ्यंगम दर्द निवारक तैल का प्रयोग बता रहा हूँ ये एक अक्सीर चिकित्सा प्रयोग है जिसके प्रयोग से तुरंत ही लाभ होता है-

कमर दर्द-पीठ दर्द-सायटिका व घुटनो के दर्द केे लिए प्रयोग

इस प्रयोग में (अभ्यंगम) दर्द निवारक तेल से मसाज की जाती है और उसके बाद (पिंड स्वेदनम) कल्क पोटली से मसाज की जाती है जिससे गर्मी व तेल तथा मसाज के गुण एक साथ मिलते है कमर दर्द (Waist Pain) पीठ दर्द (Back Pain) सायटिका (Cytica) व घुटनो का दर्द (Knee Pain) तुरंत गायब हो जाता है यह प्रयोग आप घर पर आसानी से कर सकते हैं व दर्द से राहत पॉ सकते हैं-

तैल (Oil) बनाने की विधि-


लहसुन- 50 ग्राम
अदरक- 50 ग्राम
मेथी दाना- 50 ग्राम
हल्दी- 50 ग्राम
एलोवेरा गुदा- 50 ग्राम
आक के पत्ते- 20 पीस
नीलगिरी के पत्ते- 30-40 पीस
तिल तैल- 500 ml
सरसो का तेल- 500 ml


बनाने की विधि- 


सबसे पहले आप रात को मेथी ओर हल्दी को 100ml पानी मे भिगो दें फिर सुबह बड़े पात्र में दोनों तैल (तिल व सरसों) तथा भिगोई मेथी के साथ डाले तथा अदरक, लहसुन को मोटा-मोटा कूट कर डाले और एलोवेरा गुदा और दोनों पत्तो को छोटे-छोटे टुकड़े इसी तैल में डाले-

अब इस सामग्री को आप 3 घण्टे तक पड़ा रहने दें और फिर तीन घंटे के बाद धीमी आंच पर पकाएं और जब सारा पानी जल जाए और सारी सामग्री तैल में पक कर कड़क हो जाए और तेल उबल जाए तब तक आप इसे पकाएं फिर ठंडा करके साफ बड़े कपड़े से इसे छान लें और छानने पर कपड़े में जो चूरा शेष बचे उसे उसी कपड़े में पोटली बांधकर किसी पात्र में सुरक्षित रख दे-


प्रयोग विधि-


अब आप दर्द वाले स्थान पर ऊपर बनाए गए तैल से मसाज करें तथा मसाज के बाद रक्खी हुई चूरे की पोटली को तवे पर हल्का गर्म करके दर्द के स्थान पर सेक करे-

इस पोटली में बंधे औषधि चुरा ओर उसमे बचा हुआ तेल सेक के दौरान त्वचा में आसानी से जब्ज हो जाता है और दर्द निवारण होता है-

विशेष सूचना-

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किसी भी लेख को पढ़ने के बाद अपने निकटवर्ती डॉक्टर या वैद्य के परमर्श के अनुसार ही प्रयोग करें-  धन्यवाद। 

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फोड़े-फुंसी-सूजन-कांख का फोड़े का उपचार

Boils-Pimple-Swelling-Armpit Boils-Treatment


आजकल वातावरण भी फोड़े-फुंसियों (Boils-Pimple) को उत्पन्न करने का कारण बनता है तथा कुछ संक्रामक रोगों के कारण शरीर पर फोड़े-फुंसियां निकल आती हैं फोड़े-फुंसियों के निकलने पर उनमें खुजली-जलन होती है तथा रोगी बेचैनी महसूस करता है-

फोड़े-फुंसी-सूजन-कांख का फोड़े का उपचार

फोड़े-फुंसी (Boils-Pimple) होने का मुख्य कारण-


अधिक मिर्च-मसाले खाने, तेल तथा डालडा घी के अधिक सेवन के कारण भी फुंसियां निकल आती हैं तथा बालों की जड़ों में एक सूक्ष्म कीटाणु का संक्रमण होने से फोड़े-फुंसियां निकल आती हैं इसके अलावा खून की खराबी, आम का अधिक प्रयोग करने, कच्ची अमिया खाने, आम की चेंपी लगने, मच्छर के काटने आदि के कारण भी फुंसियां निकल आती हैं त्वचा के नीचे वाली परत में सूजन या दर्द के बाद पीव भर जाती है वही फुड़िया या फुन्सी होती है-कई बार-पैरों या जांघों में एक बाल के साथ दूसरा बाल निकलने की कोशिश करता है तब बलतोड़ (फोड़ा) बन जाता है तथा बरसात के गंदे पानी के शरीर से देर तक लगने की वजह से भी कभी-कभी फुंसियां उत्पन्न हो जाती हैं-

क्या है फोड़े-फुंसी (Boils-Pimple) की पहचान-


फोड़े-फुंसी-सूजन-कांख का फोड़े का उपचार

फोड़े-फुन्सी में पहले दर्द होता है इसके बाद जब वे पक जाती हैं तो उनमें कील और पीव पड़ जाती है कुछ फोड़े-फुन्सी नुकीले बन जाते हैं और तब वे फूट जाते हैं उनमें चसक तथा लपकन पड़ती है कुछ फुंसियां बिना पके ही बैठ जाती हैं लेकिन इनके भीतर पानी तथा पीव भरी रहती है इसलिए कुछ दिनों बाद वे पुन: पककर फटती हैं इनमें दर्द तथा जलन भी होती है-

फोड़े फुंसी के लिए घरेलू उपचार (Boils-Pimple)-


1- फोड़े और फुन्सी को ठीक करने के लिए आप 1 से 3 ग्राम त्रिफला का चुर्ण (Triphala Powder) भी खा सकते हैं और इस चुर्ण को पानी में घोलकर फोड़े और फुंसी को धो भी सकते हैं दोनों ही प्रकार से त्रिफला के चुर्ण का प्रयोग करने से फोड़े और फुंसी जल्दी ठीक हो जाते हैं-

2- यदि किसी व्यक्ति को फुंसियाँ हो गई हैं तो इन्हें ठीक करने के लिए कुछ अरंडी के बीज (Castor Seeds) लें और उनकी गिरी को पीस लें अब आप इसकी पुल्टिस बना लें और इसे फोड़े या फुंसी पर बांध लें इस प्रयोग से फोड़ा या फुंसी जल्दी ही ठीक हो जायेंगें-

3- यदि आपकी फोड़ा या फुंसी पक गई हैं और उसमें से निरंतर खून बह रहा हैं तो आप अधिक रक्त बहने से रोकने के लिए सुहागा (Borax) लें और उसे बारीक पीस लें-इसके बाद इसका लेप फोड़े या फुंसी पर करें-इसे लगाने के साथ ही खून बहना बंद हो जाएगा तथा घाव भी जल्द ही भर जाएगा-

4- फोड़े और फुंसी होने पर आम के फल की गुठली (Mango’s Seed) लें और अनार और नीम के पेड़ की कुछ पत्तियां लें और उन्हें पीस लें इन तीनों को अच्छी तरह से पिसने के बाद इसे फोड़े और फुंसी पर लगा लें-आपको लाभ काफी राहत मिलेगी-

5- फोड़े और फुंसियों से छुटकारा पाने के लिए थोडा कालाजीरा (Black Cumin) लें और उसके साथ थोडा सा मक्खन लें-अब इन दोनों को एक साथ खा लें-

कांख की गांठ (Armpit Lumps)-


1- कांख के नीचे या आस-पास अगर गांठ निकल जाएँ तो इसे ठीक करने के लिए आप कुचला लें और उसे पानी के साथ पीस लें-पिसने के बाद इसे थोडा गर्म कर लें और इसका लेप फोड़े या फुंसी पर लगायें-फोड़ा ठीक होने के बाद भी कुछ दिन लेप का प्रयोग अवश्य करते रहे जिससे दुबारा निकलने की संभावना नहीं रहती है-कुचला आसानी से पंसारी से मिल जाता है-

2- इसके अलावा आप कांख के फोड़े या फुंसी को ठीक करने के लिए अरंडी का तेल लें, गुड़ लें, गुग्गल तथा कुछ राई के दाने लें और इन्हें एक साथ पीस लें फिर पिसने के बाद इस मिश्रण में थोडा सा पानी मिला लें और इसे थोडा गर्म कर लें तथा अब इस मिश्रण को  आप फोड़े पर लगा लें-फोड़ा जल्द ही बिल्कुल ठीक हो जाएगा-

कंठमाला (Scrofula) की गांठों का उपचार-


1- जब गले में दूषित वात, पित्त और मेद गले की पीछे की नसों में एक साथ इकट्ठे हो जाते हैं और धीरे-धीरे ये फैलने लग जाते हैं जिसके कारण गले में छोटी-छोटी गांठे उत्पन्न हो जाती हैं-उन्हें गण्डमाला या कंठमाला कहते हैं गण्डमाला के कारण निकली हुई ये गांठे गर्दन में निकलना शुरू होती हैं और धीरे-धीरे कंधे तथा जांघों में हो जाती हैं-ये गांठे देखने में बहुत ही छोटी होती हैं और फिर धीरे-धीरे ये पक जाती हैं अगर आपके भी गले में कंठमाला का रोग हो गया हैं तो इसे ठीक करने के लिए आप नीचे दिया गया उपाय आजमा सकते हैं-

2- कंठमाला की गांठों को ठीक करने के लिए क्रौंच के बीज (Kaunch Beej) लें और उन्हें घीस लें और  इसके बाद इसका लेप गांठों पर करें आप जल्द गांठों से राहत पाने के लिए आप इस लेप को लगाने के साथ-साथ अरंडी के पेड़ की पत्तियों के लगभग 80 ग्राम रस का भी सेवन कर सकते हैं-

3- कंठ माला की गांठों से जल्द मुक्ति पाने के लिए कफ बढाने वाले पदार्थों का सेवन बिल्कुल सेवन न करें-

फोड़े से पस या मवाद बहने (Pus) के लिए उपचार-


1- फोड़ा या फुंसी जब पक जाए और उसमें से पस या मवाद बहने लगे तथा इसके साथ ही पीड़ा भी हो तो थोडा अरंडी का तेल (Castor Oil) लें और आम के पत्तों की राख लें और अब इन दोनों को एक साथ मिलाकर आप अपनी फुंसी पर लगा लें-जल्द ही फोड़ा ठीक हो जाएगा-

2- फुंसियों को ठीक करने के लिए थूहर का पत्ता (Euphorbia Leaves) लें और उस पर अरंडी का तेल (Castor Oil) लगा लें अब इसके बाद इस पत्ते को हल्का सेंक लें फिर इस पत्ते को उल्टा कर लें और इसे फोड़े पर बांध दें-इस पत्ते को बांधने से फोड़े से सारा मवाद बाहर निकल जाएगा और जल्द ही फोड़ा या फुंसी ठीक हो जायेगा-

पीठ पर फोड़ा (Boil On Back) होने पर-


यदि किसी व्यक्ति की पीठ पर फोड़ा हो जाये तो कोई भी व्यक्ति इसे ठीक करने के लिए वह गेहूं के आटे (Wheat flour) का प्रयोग कर सकता हैं अप इसके लिए थोडा सा आटा लें और उसमें थोडा नमक और पानी डाल लें और अब आप इस आटे की पुल्टिस बना लें और इसे पीठ के फोड़े पर लगा लें चार या पांच दिन लगातार लगाने से फोड़ा ठीक हो जाएगा-

सूजन (Swelling) होने पर करे उपचार-


1- शरीर में सूजन आ जाने पर अनानास का एक पूरा फल प्रतिदिन खाने से आठ दस दिनों में ही सूजन कम होने लगती है तथा पन्द्रह बीस दिनों में पूर्ण लाभ हो जाता है-

2- अगर घाव में सूजन हो तो रेंड (एरण्ड) के पत्ते का तेल लगाकर गर्मकर बांध दें आपकी सूजन खत्म हो जायेगी-

3- हरी मकोय के अर्क में अमलतास के गूदे को पीसकर सूजन वाली जगह पर लेप करने से सूजन कम हो जाती है-

4- ग्वारपाठे के टुकड़े को एक ओर से छीलकर उस पर थोड़ी सी पिसी हुई हल्दी छिड़के तथा आग पर गरम करके सूजन वाले स्थान पर बांध दें तो सूजन कम हो जाती है इसे तीन चार बार बांधना चाहिए-

अण्डकोषों की सूजन (Andkoshon Inflammation)-


तम्बाकू के हरे पत्तों को भी आग पर सेंककर बांधने से अण्डकोषों की सूजन दूर हो जाती है यदि हरा पत्ता न मिल सके-तो आप सूखे पत्ते पर पानी छिड़ककर उसे मुलायम कर लें-तत्पश्चात उस पर तिल का तेल चुपड़कर आग पर गर्म करें और अण्डकोशों पर बांध दें-


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