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29 मार्च 2017

जातिवाद और सम्प्रदायवाद की राजनीति कब तक होगी

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क्या कभी सोचा है कि भारत को हम सब मिल कर आखिर कैसा देश बनाना चाहते है?कभी सोचा है कब तक हम सब जातिवाद धर्म सम्प्रदाय की राजनीति करते रहेगें? कुछ छणिक लाभ के लिए हम आखिर अपने देश को को कहाँ लें जा रहे है? हो सकता है मेरी पोस्ट पढ़ कर कुछ निजी स्वार्थी लोगों को तकलीफ होगी लेकिन मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है क्युकि यही वास्तविक सत्य है-


जातिवाद और सम्प्रदायवाद की राजनीति कब तक होगी

जब भी लैपटॉप खोलता हूँ तो कुछ लोगों के दिल में समर्थन और असमर्थन का धुंवा सा उठता देखता हूँ हर एक की अपनी-अपनी सोच और अपना-अपना विचार है ख़ास कर आज कल सोसल मीडिया पर फैलाई जाने वाली पोस्ट का धुंवा है जो लोगों के बीच जहर की तरह फैलता जा रहा है कुछ लोगों ने अपने-अपने समुदाय के मानने वालों ने सिर्फ ये जातिवाद ,सम्प्रदायवाद,एकतावाद,क्षेत्रवाद का जहर बोने का ठेका सा ले रक्खा है-

आजकल जातिवाद और एकता की बात करने में कुछ कतिपय लोग लगें है मै उनसे एक सवाल पूछना चाहता हूँ आप आखिर ये जातिवाद की रोटी कब तक सेंकते रहेगें ब्राम्हणवाद, राजपूतवाद, जाटवाद, यादववाद, कायस्थवाद,गुर्जर और मीना और अंत में दलित और अल्पसमुदायवाद-क्यों देश को अनेक वाद में बदलने में लगे हो जब आप आपस में ही मनुष्यवाद को बांटना चाहते हो तो फिर आपका देश कभी महानता की ओर कैसे बढेगा फिर तो इसकी कल्पना करना सिर्फ एक बेमानी ही कहा जा सकता है-

पहले भी बँटवारे की राजनीति का परिणाम खतरनाक ही हुआ है और आज तक हम अपने देश के बँटवारे की वजह से परेशान है अपने ही घर को देखों शादी के बाद जब आपकी आने वाली बहूँ अपने पति को लेकर बँटवारे की बात करती है तो आपको कितना महान कष्ट होता है क्या आप अपने पुत्र का विवाह ये सोच कर करते है कि बंटवारा करना है शायद नहीं-लेकिन जब-जब बंटवारा होता है तो दुष्परिणाम ही देखने को मिलता है-

पहले के राजा महराजा अपने-अपने राज्य को बाँट चुके और परिणाम क्या मिला इसका इतिहास गवाह है की राजपूतो ने कभी एक-दूसरे राजपूत की मदद नहीं की बस सब अपनी ही मूंछ पर ही ताव खाते थे और जब मुग़ल एक किले पर हमला करते तो दूसरे किले के राजा तमाशा देखते थे बस राजपूत क्षत्रिय राजाओ में यही सबसे बड़ी कमजोरी थी जिसका फ़ायदा मुग़ल उठाते थे इसलिए मुगलो ने 800 साल तक हम पर राज किया ये एक कड़वी सच्चाई है जिसे जानकर भी हम सभी अनजान है और आज भी आजादी की लड़ाई के बाद यही प्रथा शुरू कर रहें है-

आज कायस्थ समाज कायस्थ एकता की बात कर रहा है उन सभी कायस्थ भाइयों से एक बात पूछना चाहता हूँ कि आप अपना एक अलग समाज क्यों बनाने की बात करते है क्या आपको भी बहती गंगा में हाथ धोना है या राजनीति की रोटियां सेंकनी है एक तरफ तो आप खुद को सर्वश्रेष्ठ बताते हो और दूसरी तरफ आप भी समाज में आरक्षण और एकता की बात करते हो आखिर इस एकता की राजनीति से आप भी पूरे समाज को वही देना चाहते हैं जो दूसरे जातिगत के लोगों ने आज तक किया है और परिणाम आप सब के सामने है आखिर हम मनुष्यवाद की ओर कब ध्यान देगें

आज के दौर में आतंकवाद को किस तरीके से परिभाषित किया जाए ये भी विवाद का एक मुद्दा है इस संवेदनशील मामले में प्रचलित विचारधारा यह है कि किसी एक के विचार में जो आतंकवादी है वह दूसरे के विचार में स्वतंत्रता सेनानी हो सकता है ऐसे में दोनों ही पक्षों को अपने विचारों की अभिव्यक्ति की आज़ादी मिलनी चाहिए लेकिन हिंसा इस समस्या का हल नहीं हो सकता है-

आज आतंकवादियों के ख़िलाफ़ इस लड़ाई में दुनिया के सभी देश एक-जुट नज़र आ रहे हैं लेकिन इन सभी कोशिशों के बावजूद आतंकवाद की परिभाषा अभी तय नहीं हो पाई है हाँ अलबत्ता ब्रिटेन एक ऐसा देश है जहाँ आतंकवादी हरकतों को कानूनी तौर पर परिभाषित किया गया है ब्रिटेन सरकार के मुताबिक ऐसी कोई भी हरकत आतंकवाद है जिसमें किसी सरकार पर किसी काम को करवाने के लिए ग़ैरकानूनी तरीके से जबरन दबाव डाला जाए-

कुछ वर्षो पहले भी कुछ जातिगत लोगों ने अपना वर्चस्व रख कर दूसरे जातिगत लोगों पर अत्याचार किया है ब्राह्मणों ने कभी किसी दूसरी जाती वालों का सम्मान नहीं किया और यहाँ तक कि दलितों को तो मंदिर भी नहीं जाने देते थे ब्राह्मणों की छुआछूत के भेदभाव के कारण विश्व और देश में हिन्दुत्व को बदनामी मिली और ईसाईयो और मुसलमानों को दलित हिन्दुओं को धर्मपरिवर्तन करने में सफलता मिली है हिन्दुत्व का जो नुकसान हुआ उसमें ब्राह्मणों की भी एक बहुत बड़ी भुमिका है चाहे वो मानें या ना मानें इससे समाज को कोई फर्क नहीं पड़ता है-आज का युवा समझदार हो गया है इन सब चीजों से बाहर निकल कर विकास के रास्ते पर बढ़ना चाहता है लेकिन आज भी कुछ स्वार्थी लोग अपने स्वार्थवश समाज में अनेक भ्रांतियाँ फैलाने में अपना योगदान करते नजर आ रहे है-

अब भी समय है संभल सकते है खुद को सारे बेकार के "वाद-विवाद" निकाल कर मनुष्यवाद की ओर अग्रसर हों-जब भी सोचों तो अपनी और अपने देश की उन्नति के बारे में सोचो-बाकी राजनीति तो उन लोगों के लिए है जो सिर्फ सत्ता ,पदलाभ के लिए राजनीति में कदम रखते है हमें तो इनमें से कुछ अच्छे लोगों का साथ देना या चुनाव करना है जो राष्टहित में कार्य कर सकें और सबको साथ लेकर देश का और समाज का विकास कर सकें-

3 टिप्‍पणियां:

  1. आतंकवाद का एक ही धर्म है, इस्लाम, कुरान में जो लिखा है मुसलमान उसे अंतिम सत्य मान कर व्यवहार करते हैं। उसके अनुसार इस्लाम ही वाहेद सच्चा मजहब है एक अल्ला के अलावा सब कुफ्र है, जो अन्य धर्म के अनुयाई हैं वो सब काफिर हैं, और उन्हें जीवित रहने का अधिकार नहीं है, उन्हें मार डालना चाहिए, उनकी स्त्रीयों पर कब्जा कर लेना चाहिए, उन्हें लूट लेना चाहिए। इस्लाम में 74 उप संप्रदाय हैं जैसे शिया सुन्नी, अहमदिया, बोहरा आदि, हर उप संप्रदाय अपने आपको अस्ली और बाकी सबको काफिर मानते हैं, इसीलिए मुसलमान कभी भी शांति से नहीं रह सकते, पहले सबको मार काट कर जोर जबर्दस्ती से मुसलमान बनाएंगे फिर जब सारे मुसलमान बन गए तो आपस में उपसंप्रदाय की संप्रभुता सिद्ध करने के लिए मार काट मचाएंगे, जैसा कि पाकिस्तान में हो रहा है। लेबनान देश जब आजाद हुआ था 1960 में तब वो ईसाई देश था, काफी समृद्ध देश था, विश्वविद्यालय विश्व प्रसिद्ध थे, फिर उसने यूरोप वाली मूर्खता अपनाई, और अन्य देशों से शरणार्थी स्वीकार करना शुरु किया, 30 वर्ष के दौरान उस देश की आधी आबादी मुस्लिम हो गई, फिर गृहयुद्ध शुरु हो गया, ईसाइयों को खदेड़ खदेड़ कर अपना इलाका बनाया, और इस्लामिक मुल्कों से आर्थिक और सामरिक सहायता ले कर देश को बर्बाद करना शुरु कर दिया। तबाह देश है लेबनान। इराक - ईरान मे युद्ध शुरु हुआ 1982 में 1990 तक युद्ध चला, दोनों देशों ने 80 लाख लोगों को गँवाया, एक पीढ़ी पूरी की पूरी युद्ध में समाप्त हो गई, एक समय था कि इराक ईरान में 40 वर्ष से कम आयू के पुरुष मिलते ही नहीं थे, जैसे ही की 18 वर्ष का हुआ सेना उसे भर्ती करके सीमा पर भेज देती थी लड़ने को, दोनों देशों में व्यभिचार बहुत बढ़ गया। अर्थ व्यवस्था चौपट हो गई यह सब उसे मंजूर था मगर युद्ध विराम मंजूर नहीं था, क्योंकि कुरान मे नहीं लिखा है compromise करने का। यही वजह है कि किसी भी मुसलमान देश में लड़ाई शुरु हो जाती है तो बंद नही होती, क्योंकि फिर कुरान में लिखा है कि इस जीवन में कोई सुख नहीं है, अगर आप धर्म के लिए लड़ते हुए मर जाओ तो आपको जन्नत मिलेगी जहाँ 72 कुमारी कन्याएं मिलेंगी और शराब की नदीयाँ मिलेंगी। हिन्दू जब दुखी होता है तो वैराग्य अपना लेता है मुसलमान दुखी होता है दुनिया से तो जन्नत की खोज में आतंकी बन जाता है, कहाँ गुंजाईश आप ढूंढ रहे हैं दृदय परिवर्तन की

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    1. आपने लिखा है कुछ हद तक सत्य है लेकिन पूर्णतया सत्य नहीं है हमारे देश के और अन्य देश के मुस्लिम में थोडा अंतर है यहाँ सबसे बड़ी समस्या है कि पिछले 70 सालों में मुस्लिम में शिक्षा का प्रसार-पचार का अभाव रहा है और लोगों से इस धर्म समुदाय के लोगों को वोट की राजनीति के लिए इस्तेमाल किया गया है जादा तर गरीबी के कारण कुछ युवा मार्ग से भटक अवश्य गए है मानता हूँ तथा आज मुस्लिम युवा में थोडा जागरूकता आई है जो अब समझने लगे है लेकिन मेरा लेख जाति से उपर उठ कर देश के विकास के बारे में है इसके लिए सभी को सोचना होगा चाहे वो किसी भी मजहब जाति धर्म के हों -सुधार की और जागरूकता की आवश्यकता है -

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ’ट्रेजडी क्वीन अभिनेत्री के संग लेखिका नाज को नमन करती ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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